मल्हार
अचानक
किसी बसंती सुबह
तुम गरज बरस
मुझे खींच लेते हो
अंगना में .
मैं तुममें
नहा लेने को आतुर
बाहें पसारे
ढलक जाती हूँ .
मेरा रोम रोम
तुम चूमते हो असंख्य बार .
अपने आलिंगन में
भिगो देते हो
मेरा पोर पोर.
मेरी अलसाई पलकों पर
शीत बन पसर जाते हो.
माटी के बुलबुलों में छुपकर
मेरी पायल का
उन्माद थामते हो.
मेरा हाथ पकड़
जिस डार तले
तुम खींचते हो,
उसकी कनखियों से
मैं लजा जाती हूँ.
नाखूनों से खुरचती हूँ
जमीन.
और हाथ पसार
कुछ मुक्ता जुटाती हूँ.
शिख नख
तुम ह्रदय बन झरते हो.
मुझे हरते हो .
बारिश संग
जब
तुम बरसते हो.
-अजन्ता
अचानक
किसी बसंती सुबह
तुम गरज बरस
मुझे खींच लेते हो
अंगना में .
मैं तुममें
नहा लेने को आतुर
बाहें पसारे
ढलक जाती हूँ .
मेरा रोम रोम
तुम चूमते हो असंख्य बार .
अपने आलिंगन में
भिगो देते हो
मेरा पोर पोर.
मेरी अलसाई पलकों पर
शीत बन पसर जाते हो.
माटी के बुलबुलों में छुपकर
मेरी पायल का
उन्माद थामते हो.
मेरा हाथ पकड़
जिस डार तले
तुम खींचते हो,
उसकी कनखियों से
मैं लजा जाती हूँ.
नाखूनों से खुरचती हूँ
जमीन.
और हाथ पसार
कुछ मुक्ता जुटाती हूँ.
शिख नख
तुम ह्रदय बन झरते हो.
मुझे हरते हो .
बारिश संग
जब
तुम बरसते हो.
-अजन्ता

अद्भुत ! अति सुन्दर ! अद्वितीय !
ReplyDeleteपढने पर ऐसा लगता है जैसे ये शब्द बारिश की बूँदे बनकर मन पर बरस रहे हैं और पूरा अस्तित्व उसे आत्मसात कर रहा है.... हर शब्द बार बार पढने को जी चाहता है. जैसे आनंद का कोई अक्षय स्रोत हो.
आपके लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आपके शब्दों का चयन और कहने का तरीका ऐसा होता है कि वह पाठक को विवश कर देता है उन अनुभूतियों के सागर में डूबने उतराने को जिनसे प्रेरित होकर आपने लिखा होता है.
वास्तव में एक रचना और रचनाकार की सफलता इसी में है कि उसकी बात पाठक तक ठीक उसी रूप में और उतनी ही भावनात्मक तीव्रता लिए हुए पहुँच जाए जिस रूप और तीव्रता से लिखी गयी हो.
सदा की ही तरह मन और मानस पर अपना हस्ताक्षर अंकित करती हुयी एक बहुत ही सुन्दर रचना!
एक अनुरोध - कृपया कविताएँ पोस्ट करने की आवृत्ति को थोडा और बढा दें.
बहुत सुन्दर प्यारी अभिव्यक्ति व्यक्त की है आपने
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर रचना
ReplyDeleteमाटी के बुलबुलों में छुपकर
ReplyDeleteमेरी पायल का
उन्माद थामते हो.
मेरा हाथ पकड़
जिस डार तले
तुम खींचते हो,
उसकी कनखियों से
मैं लजा जाती हूँ.
बहुत ही लाजवाब निशब्द हूँ बहुत ही सुन्दर अभव्यक्ति है बधाई
really cool love poem. i could really get involved in it by just reading it self.
ReplyDeleteअजंता जी, आप अनुमति दें तो इस कविता को नुक्कड़ पर लगा दूँ- http://nukkadh.blogspot.com/
ReplyDeleteअपनी अच्छी सी फोटो भी भेज दें।
-सुशील कुमार
sk.dumka@gmail.com
bahut hi achhi kavita hai . bhai pratap narayan ji ne itna kuchh kah diya hai ki kuchh aur kahne ke liye shabd dhoondhne parenge. unke anurodh men swar milate hue main nikat bhavishya men aur rachnaen padhne ki kamna karta hooon---- shailendra
ReplyDeleteबहुत अच्छी कविता लिखी है आपने और सही सावन के ही समय पर लिखा है जब मल्हार का खास महत्व होता है.
ReplyDeleteरुत सावन की, भाव मल्हार के और बारिस की बूंदे और साथ पिया मन बसिया, मन भावन तो काहे ना भाये रुत सावन.
शिख नख
ReplyDeleteतुम ह्रदय बन झरते हो.
मुझे हरते हो .
बारिश संग
जब
तुम बरसते हो.
बहुत सुन्दरता लिए हुए एक उम्दा रचना. वैसे तो आपकी रचनाऐं हमेशा ही दिल को भाती है और आज भी.
बधाई.
Apratim ajanta ji ........apratim !!!
ReplyDeleteAapke shabdon ke jadoo ne aatm vimugdh kar diya....
Bahut hi sundar likhti hain aap....Satat sundar lekhan ke liye bahut bahut shubhkamnayen...
सुन्दर... प्यार को गहराईयों से महसूस कर लिखी गई रचना..
ReplyDeleteAjanta,
ReplyDeleteYou never cease to amaze me with your observations and the way you so beautifully weave emotions in words!
I was waiting for you to write on rain since I like rain myself so much that I was wondering how to translate my these thoughts on rain that, “sometimes when I am drenched in rain which has so much water and which is so continuous that I resent having a such a small body and not being able to take every drop on myself!”
…….. such eternal enormousness of rain and such incapacities of my body!
Bhole
अन्दर तक भिगोती हुई भीनी भीनी सी कविता .......
ReplyDeleteAjanta, bahut sundar abhivyakti hai, Sheershak se milane ke liye 2 panktiyan man mein aayee-
ReplyDeleteJab tum baraste ho; boondon ki tap tap se sangeet ka anubhav hota hai,mano gram balayen sawan mein malhaar ga rahi hon:
kunwar
अजंता,
ReplyDeleteप्रशंसनीय और लाजवाब!!
कविता पूरी जीवित है और रूमानी भी. कहीं कहीं तो सांसों का स्पंदन भी सुनाई पड़ रहा है.
कितना अच्छा होता यदि इसका ऑडियो फाइल भी होता.
एकबार फिर सफल हुई अजंता. बधाई!!!
अजंता जी,
ReplyDeleteआपकी रचनाएँ हर बार क नया भाव एवं विषय लिए हुए आती हैं और ह्रदय को बहुत अन्दर तक भिगो देती हैं...
आप की लेखन में बहुत ज्यादा अन्तराल तो रहता है परन्तु उम्दा रचनाये पढ़कर मन बल्लियाँ उछलने लगता है...
लिखती रहें और हमारे दिलों को इसी तरह हर्षाती रहें...
क्या आपने मेरी रचनाओं को पढ़ा तो गुण-दोष से अवगत अवश्य कराएँ...
Knowing Ajanta:
ReplyDeleteIt's great to see such admiration for Ajanta's poetry; she deserves it and more! I have seen many of her creations, which are not limited to poetry alone. She is an excellent writer, dabbles in many different sub-forms of poetry, her compositions are, I would say, emotionally intelligent. As is obvious from the drawings on this site, she is a refined artist as well. Besides, she is an amazing singer with an extensive technical knowledge of music; she also plays a few instruments. She knows dance and has also acted on stage. She is an avid reader and a music afficionado. There's hardly an art-form that she doesn't know. Her talents go beyond art. She is an exceptional orator. Her level-headedness and intellect, maturity beyond her years and ability to have a balanced view of situations and tricky conundrums, have earned love and respect from many friends. Academically too, she excels in everything she undertakes.
I am proud to have known her closely over the years. I wish she gets a much bigger stage to display her talents to a much wider audience and that she is successful in all that she does.
Dear Ajanta, you have redefined sensuality with this poem. I am too small a person to comment on it. All I can say is that I found myself drenched after reading it. Keep creating...
Hi Mam,
ReplyDeleteIt is fantastic. For a momemt, I went into a different world. So beautifully described. Highly romantic. Truly, words are the best way to express our feelings.
Will love to see many more poems like this. Keep sharing.
Cheers!
Dimple
It's simply superb!!!
ReplyDeleteBest regards,
Jitendra
ठीक २४ घंटे पहले जब मैंने इस कविता को पढा था तो उस वक्त सिर्फ एक comment आप के लिए था | और अब १९ comments ! जबतक मेरी यह प्रतिकृया पोस्ट होगी तबतक न जाने कितने और comments जुड़ चुके होगे | यह एक पैरामीटर है जो आप और आप की कविता की लोकप्रियता दर्शाता है |
ReplyDeleteआप ने मौसम को बड़ी खूबसूरती से कैश किया है | सावन के महीने में एक एक बुद के लिए तरसता आदमी जब इस कविता को पढ़ता है तो वह कुछ समय के लिए संम्पूर्ण रूप से भीग जाता है | बरसात का पूरा आनंद लेता है | अपनी प्यास को बुझाता है | सावन मनभावन क्यों है यह जानने के लिए आप का मल्हार काफी है | इस मल्हार को पाकर वह सावन की शिकायत करना भी भूल जाता है |
मेरा अपना आकलन है की जब से आप ने हिन्दी के आसान शब्दों का प्रयोग करना शुरू किया है तह से आप की रचनाए काफी दूर तक जाने लगी है | आप ने कुछ और घरेलू शब्दों का खूबसूरत प्रयोग कर उन शब्दों के महत्त्व को बढाया है जैसे - अगना ,ढलक जाना , डार तले, कनखियों, खुरचती हूँ , हाथ पसारे , तभी तो कुछ पाठक जो अपनी प्रतिक्रया को हिन्दी में नहीं दे सकते वे english में दिए है |
सभी प्रतिक्रियाए आप के पक्ष में जा रही है किन्तु यह अच्छा नहीं है | रचनाओं को और खूबसूरत बनाने के लिए आलोचना भी जरूरी है जो अभी तक के comments में दिखाई नहीं दिया | जब कोई रचना सम्पूर्णता के करीब होती है तो ऐसा ही होता है |
this is very good
ReplyDeletePlz continue
a very excellent poem di. iam not surprised. I know how good u think ans write :-).
ReplyDeletejis anubhuti ka zikar sabne kiya woh yeh nahi jaan paye ke kavitri ke mann mein kitne anumad thei isse likhte huye. aise anumadit mann ko pranam. kyun ki issi mann ne iss kavita ki srijana ki.
ReplyDeleteबहुत सुन्दर व बढिया रचना है।बधाई।
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना है अजंता जी..बेहद उम्दा लिखती हैं आप..
ReplyDeleteसुन्दर सरल और गहरी अभिव्यक्ति..वाकई..
चित्र भी बहुत सुन्दर है..
बहुत भावस्पर्शी अभिव्यक्ति है..बधाई
ReplyDeleteसुन्दर भाव. बधाई.
ReplyDeletehttp://hariprasadsharma.blogspot.com/
bemishal abhivyakti ....afreen afreen
ReplyDeletesab kuch to sab ne keh diya hain advitiya or aseem ghehrayee se sarash mohak bhawon se sarabor ..........romantic...behad achcha likhty hain aap to ...eshi bheegty rahiye or likhty rahiye ta-umer aap...
Roshni ke parav .....deepawali ki subhkamnayen
I return again and again to read this poem...it reminds me of every rain that drenched me....
ReplyDeleteThank you for painting such beautiful pictures!!