अपने जीवन के उन क्षणों में
मैं अदृश्य ही रही,
अनावश्यक,
अकारथ ,
बेजा विषयों की दासी बनकर.
व्यर्थ रहकर
काटती रही हर लम्हा
अपनी एकटक निगाहों से,
तुम्हारी
ही चाह में .
तुम्हारा
गुजरना ही हुआ,
मेरी पथराई छाती पर
हल सा.
मुझे भेद
मेरी चेतना को जगाता.
तुम्हारा याद करना ही हुआ
किसी चिथड़ी किताब की मढ़ाई,
कोमल उँगलियों से पन्ने पलटना,
हर पंक्ति के कराहों की सुनवाई.
मेरी आकृति,
मेरी मुस्कान
तुम्हारी ही चाक पर गढ़ी है.
पोखर किनारे की
ये गीली माटी
आज
पुतुल सजकर
तुम्हारे हाथ जड़ी है.
-अजन्ता

बड़े दिनो के बाद अन्तत: प्रतीक्षा समाप्त हुई और आपके ब्लाग पर आपकी लिखी उत्कृष्ट कविता और आपकी रचनात्मक बहुमुखी प्रतिभा को फिर से एक बार मुखरित करती सुन्दर रेखाकृति ने मुझे कुछ लिखने को विवश कर दिया-
ReplyDeleteकिसी स्त्री का समर्पण अवलम्बन नही होता यह उसकी उदारता और उस चरम सोच की अभिव्यक्ति होती है जो उसे लोगो की नजरो मे आदर और श्रद्धा का पात्र बना देता है, एक स्त्री की उसी समर्पण और अतुल्य, अथाह प्यार को अभिव्यक्त करती आपकी कविता के कई शब्दो मे वेदना के भीतर भी एक प्रेयसी की मुस्कुराहट छिपी प्रतीत होती है.
मै नही जानता कि आपने किस स्त्री पात्र को ध्यान मे रखकर इस कविता का सृजन किया है लेकिन सदैव की तरह मै आज भी आपकी पन्क्तियो के समक्ष नतमस्तक हू, और आपके उस काल्पनिक पात्र के प्रति श्रद्धानवत.
मेरी आकृति,
मेरी मुस्कान
तुम्हारी गढ़ी है ही चाक पर.
पोखर किनारे की
ये गीली माटी
आज
पुतुल सजकर
तुम्हारे हाथ जड़ी है.
यह पन्क्तिया केवल इसी गन्गा यमुना की संस्कृति को समेटे भारत की माटी पर पलने वाली स्त्री ही लिख सकती है.
आपका कृपांकाक्षी
पोखर किनारे की
ReplyDeleteये गीली माटी
आज
पुतुल सजकर
तुम्हारे हाथ जड़ी है......
beautiful lines.......I could not agree more with the last lines of Anonymus....too....but I see that unfathomable pain has driven some one to come up with such searing lines.....I wish I could express myself in same way....
Bhole
Wonderful!!!!....like always...inexplicable..full of intoxicating peotic splendour...Kudos!!...
ReplyDeleteWishing to keep seeing more from you always...
-Shubha Priya
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ReplyDeleteदीर्घ अन्तराल के बाद सुखद वापसी, बहुत अच्छी कविता है. बधाई
ReplyDeleteSuperb !
ReplyDeleteBut After Long time :(
bahut dini baad aapka likha padha .sundar adbhut hemsha ki tarah
ReplyDeleteAjanta ji,
ReplyDeleteKyaa laajawab kavita likhee hai. Lagtaa hai aapki ginti Amritaa Pritam jaisi kavayitriyon men ki jaa sakti hai. Mere paas prashansa ke liye shabd hi naheen hain.
Shubh kaamnaaon sahit,
Shrikrishan Makhija
बहुत अच्छी कविता है लेकिन ये ज़रा सा निराशा का भाव क्यों ? (या यह सिर्फ़ मुझे ही दिख रहा है :-)
ReplyDeleteAjanthaaji,
ReplyDeleteNice poem! Depth and Meaningful,
All the best
WAAH ! WAAH ! WAAH !!! APRATIM !!!
ReplyDeleteBHAVON KO JAISE AAPNE ABHIVYAKTI DI HAI NA...UFF..KYA KAHUN !!!
BAHUT BAHUT BAHUT HI SUNDAR !!!
Very Nice:-)) Ajay Om
ReplyDeleteरचना के भाव मन की गहराईयों से निकले प्रतीत होते हैं...बस एक कमी अखरी कि हिन्दी के बीच में उर्दू के कुछ लफ़्जों जैसे बेजा, लम्हों, निगाहों आदि का प्रयोग किया गया.. इन शब्दों को हिन्दी के शब्दों से बदला जा सकता था,,, व्यर्थ, क्षणों आदि आदि..
ReplyDeleteइसे अन्यथा न लें और लिखते रहिये.. हम पढने आते रहेंगे
मोहिन्दर
http://dilkadarpan.blogspot.com
Don't have idea about literature, but the kind of way you presented is... awesome!
ReplyDeleteGreat writing.
tumhari kavita tumse hi padhi ,achchi hai badhai.
ReplyDeleteachhi kabvita kahna na insafi hogi ''kabi-a-tareef hai
ReplyDeleteबहुत खूब अजंताजी
ReplyDeleteसाधुवाद। जो भी है, बहुत भाग्यशाली है वह, जिसके लिए आपने यह लिखा है. मैं भी मिलना चाहूंगा उस कल्पना पुरूष या यथार्थ रूप से, जिसने आपके जीवन में प्रवेश किया है आपकी इन पंक्तियों को सहेज कर रखने का, एक अनंत यात्रा के लिए या सिर्फ़ भावों के समंदर में हालाहल का विषप्याला लिये ही, इसलिए कि आपकी पंक्तियों की भाषा है, शिकायत न कर दें. आपने सिद्ध कर दिया कि आप अजनता हैं, जन सामान्य नहीं, कुछ अलग हैं, सबसे अलग. पुन: साधुवाद।
आकुल
तुम्हारा
ReplyDeleteगुजरना ही हुआ,
मेरी पथराई छाती पर.....
..very nice...
amazing poem ajanta ji , bahut dino baad aisi sashakt rachna padhne ko mili hai ...bahut se bimb ankho ke raaste dil me utar gaye ..
ReplyDeleteaabhaar .
vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com
vaaah kya likhti hain aap...
ReplyDeletebahut khoob..
sach me bahut achchi kavita...
etne dino baad??
Beautiful Poem Ajanta,
ReplyDeleteI just love to read ur poems n this one's become the favorite....
JAYA
Atti sundar
ReplyDeleteअजन्ता जी
ReplyDeleteधन्यवाद ,
आप ने फिर से किसी दर्द को पाठको के दरमियाँ इस कदर रखा है कि हर पाठक अपनी-अपनी आवाज में चित्काराने को मजबूर हो गया | कुछ है आप के अन्दर जो इस कदर निकलता है जिसके निशाँ मिटने का नाम नहीं लेती | एक लकीर खीच देती है आप हम पाठकों के मष्तिस्क में जिसकी प्रतिक्रया देने के लिए अनुकूल शब्द नहीं मिलते | बस इतना ही कहना है की बहुत खुबसूरत लगी आप की यह ये दर्द भरी कविता |
कुछ बाते प्रिय पाठक के प्रतिक्रिया से ......
------------अनूप भार्गव जी ने लिखा है की आप के कविता में निराशा के भाव सिर्फ उन्हें ही नजर आता है या किसी और को भी. अनूप जी आप के साथ मै भी हू | जहां तक मै समझता हू ऐसी अनुभूती से ही इस कविता सी सार्थकता सिध्द होती है |
---------मोहिंदर कुमार जी को उर्दू के कुछ लफ्जों से निराशा उत्पन्न हुई | मोहिंदर जी छमा चाहुगा मै आप से सहमत नहीं हू | मुझे तो बहुत अच्छा लगा |
----------आकुल जी कुछ ज्यादा ही Reactive हो गए, ये आकुल जी का दोष नहीं कविता का असर है |
और अंत में अजन्ता जी को पुन: बहुत शारी शुभकामनाएं .
आर.पी. यादव
DIDI,
ReplyDeleteEXPRESSION BEYOND EXPLANATION. THAT'S ALL WHAT I CAN SAY ON THE MASTERPIECE THAT HAS APPEARD ALL THE WAY FROM YOUR PEN.
KEEP WRITING..YOU HAVE MILES TO GO.....
ALL THE BEST
Hi Ajanta, I visited your Blog this morning and found it very enjoyable. Your poetry was impressive and warm and thoughtful. I enjoyed every poem as it reminded me of the wandering of my own thoughts. Ajanta your poetry is just great and you are a talanted woman...... Simply Incredible!!!!
ReplyDeleteI visited your blog for the first time after responding to your request to be a friend on Face book. I am overwhelmed with your power of expression and maturity to compose poems . Please takeup membership of ekavita by applying to ekavita@yahoogroups.com and enjoy the daily presentations there as well as post your poems ,too. Your face-book friend Shree Amitabh Tripathi is also a member of that group and I am well known to him . In case help is needed please let me know .
ReplyDeletekamal
उफ्फ - दर्द का समंदर - मार्मिक तथा बहुत सुंदर - परिपक्व और उच्च स्तरीय रचना के लिए बधाई
ReplyDeleteVery interesting blog. A lot of blogs I see these days don't really provide anything that attract others, but I'm most definitely interested in this one. Just thought that I would post and let you know.
ReplyDeleteमार्मिक और सधा हुआ लेखन। धन्यवाद इस रचना के लिए। नमन आपकी लेखनी को।
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