Monday, January 18, 2010

तुमसे हीं : हिंदी कविता

तुमसे हीं

अपने जीवन के उन क्षणों में
मैं अदृश्य ही रही,
अनावश्यक,
अकारथ ,
बेजा विषयों की दासी बनकर.
व्यर्थ रहकर
काटती रही हर लम्हा
अपनी एकटक निगाहों से,
तुम्हारी
ही चाह में .

तुम्हारा
गुजरना ही हुआ,
मेरी पथराई छाती पर
हल सा.
मुझे भेद
मेरी चेतना को जगाता.
तुम्हारा याद करना ही हुआ
किसी चिथड़ी किताब की मढ़ाई,
कोमल उँगलियों से पन्ने पलटना,
हर पंक्ति के कराहों की सुनवाई.

मेरी आकृति,
मेरी मुस्कान
तुम्हारी ही चाक पर गढ़ी है.
पोखर किनारे की
ये गीली माटी
आज
पुतुल सजकर
तुम्हारे हाथ जड़ी है.

-अजन्ता




29 comments:

  1. बड़े दिनो के बाद अन्तत: प्रतीक्षा समाप्त हुई और आपके ब्लाग पर आपकी लिखी उत्कृष्ट कविता और आपकी रचनात्मक बहुमुखी प्रतिभा को फिर से एक बार मुखरित करती सुन्दर रेखाकृति ने मुझे कुछ लिखने को विवश कर दिया-

    किसी स्त्री का समर्पण अवलम्बन नही होता यह उसकी उदारता और उस चरम सोच की अभिव्यक्ति होती है जो उसे लोगो की नजरो मे आदर और श्रद्धा का पात्र बना देता है, एक स्त्री की उसी समर्पण और अतुल्य, अथाह प्यार को अभिव्यक्त करती आपकी कविता के कई शब्दो मे वेदना के भीतर भी एक प्रेयसी की मुस्कुराहट छिपी प्रतीत होती है.

    मै नही जानता कि आपने किस स्त्री पात्र को ध्यान मे रखकर इस कविता का सृजन किया है लेकिन सदैव की तरह मै आज भी आपकी पन्क्तियो के समक्ष नतमस्तक हू, और आपके उस काल्पनिक पात्र के प्रति श्रद्धानवत.

    मेरी आकृति,
    मेरी मुस्कान
    तुम्हारी गढ़ी है ही चाक पर.
    पोखर किनारे की
    ये गीली माटी
    आज
    पुतुल सजकर
    तुम्हारे हाथ जड़ी है.

    यह पन्क्तिया केवल इसी गन्गा यमुना की संस्कृति को समेटे भारत की माटी पर पलने वाली स्त्री ही लिख सकती है.

    आपका कृपांकाक्षी

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  2. पोखर किनारे की
    ये गीली माटी
    आज
    पुतुल सजकर
    तुम्हारे हाथ जड़ी है......

    beautiful lines.......I could not agree more with the last lines of Anonymus....too....but I see that unfathomable pain has driven some one to come up with such searing lines.....I wish I could express myself in same way....

    Bhole

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  3. Wonderful!!!!....like always...inexplicable..full of intoxicating peotic splendour...Kudos!!...
    Wishing to keep seeing more from you always...
    -Shubha Priya

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  4. व्यर्थ रहकर
    काटती रही हर लम्हा
    अपनी एकटक निगाहों से,......अद्भुत अभिव्यक्ति !

    तुम्हारा
    गुजरना ही हुआ,
    मेरी पथराई छाती पर
    हल सा..................... किसी के अस्तित्व का महत्व इससे सुन्दर शब्दों में व्यक्त कर पाना क्या संभव हो सकता है!

    तुम्हारा याद करना ही हुआ
    किसी चिथड़ी किताब की मढ़ाई,
    कोमल उँगलियों से पन्ने पलटना,
    हर पंक्ति के कराहों की सुनवाई........ यदि इन चार पंक्तियों की व्याख्या की जाय तो चार सौ कविताएँ लिखी जा सकती हैं.

    मेरी आकृति,
    मेरी मुस्कान
    तुम्हारी ही चाक पर गढ़ी है.
    पोखर किनारे की
    ये गीली माटी
    आज
    पुतुल सजकर
    तुम्हारे हाथ जड़ी है.......इन पंक्तियों ने तो बिल्कुल ही निःशब्द कर दिया. प्रशंसा के लिए शब्दकोश का सहारा लेना पड़ेगा.

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  5. कविता इतनी सशक्त है कि चित्र के बारे में कुछ कहना ही भूल गया. अभी भूल का अहसास हुआ . कविता के भाव और चित्र के भाव, दोनों में अच्छा खासा सामंजस्य दृष्टिगत हो रहा है.

    दोनों के लिए बधाई !

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  6. दीर्घ अन्तराल के बाद सुखद वापसी, बहुत अच्छी कविता है. बधाई

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  7. bahut dini baad aapka likha padha .sundar adbhut hemsha ki tarah

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  8. Ajanta ji,
    Kyaa laajawab kavita likhee hai. Lagtaa hai aapki ginti Amritaa Pritam jaisi kavayitriyon men ki jaa sakti hai. Mere paas prashansa ke liye shabd hi naheen hain.
    Shubh kaamnaaon sahit,

    Shrikrishan Makhija

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  9. बहुत अच्छी कविता है लेकिन ये ज़रा सा निराशा का भाव क्यों ? (या यह सिर्फ़ मुझे ही दिख रहा है :-)

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  10. Ajanthaaji,
    Nice poem! Depth and Meaningful,
    All the best

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  11. WAAH ! WAAH ! WAAH !!! APRATIM !!!

    BHAVON KO JAISE AAPNE ABHIVYAKTI DI HAI NA...UFF..KYA KAHUN !!!

    BAHUT BAHUT BAHUT HI SUNDAR !!!

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  12. Very Nice:-)) Ajay Om

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  13. रचना के भाव मन की गहराईयों से निकले प्रतीत होते हैं...बस एक कमी अखरी कि हिन्दी के बीच में उर्दू के कुछ लफ़्जों जैसे बेजा, लम्हों, निगाहों आदि का प्रयोग किया गया.. इन शब्दों को हिन्दी के शब्दों से बदला जा सकता था,,, व्यर्थ, क्षणों आदि आदि..
    इसे अन्यथा न लें और लिखते रहिये.. हम पढने आते रहेंगे

    मोहिन्दर
    http://dilkadarpan.blogspot.com

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  14. Don't have idea about literature, but the kind of way you presented is... awesome!

    Great writing.

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  15. tumhari kavita tumse hi padhi ,achchi hai badhai.

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  16. achhi kabvita kahna na insafi hogi ''kabi-a-tareef hai

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  17. बहुत खूब अजंताजी
    साधुवाद। जो भी है, बहुत भाग्‍यशाली है वह, जिसके लिए आपने यह लिखा है. मैं भी मिलना चाहूंगा उस कल्‍पना पुरूष या यथार्थ रूप से, जिसने आपके जीवन में प्रवेश किया है आपकी इन पंक्तियों को सहेज कर रखने का, एक अनंत यात्रा के लिए या सिर्फ़ भावों के समंदर में हालाहल का विषप्‍याला लिये ही, इसलिए कि आपकी पंक्तियों की भाषा है, शिकायत न कर दें. आपने सिद्ध कर दिया कि आप अजनता हैं, जन सामान्‍य नहीं, कुछ अलग हैं, सबसे अलग. पुन: साधुवाद।
    आकुल

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  18. तुम्हारा
    गुजरना ही हुआ,
    मेरी पथराई छाती पर.....
    ..very nice...

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  19. amazing poem ajanta ji , bahut dino baad aisi sashakt rachna padhne ko mili hai ...bahut se bimb ankho ke raaste dil me utar gaye ..

    aabhaar .

    vijay
    www.poemsofvijay.blogspot.com

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  20. vaaah kya likhti hain aap...
    bahut khoob..
    sach me bahut achchi kavita...
    etne dino baad??

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  21. Beautiful Poem Ajanta,

    I just love to read ur poems n this one's become the favorite....

    JAYA

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  22. अजन्ता जी
    धन्यवाद ,
    आप ने फिर से किसी दर्द को पाठको के दरमियाँ इस कदर रखा है कि हर पाठक अपनी-अपनी आवाज में चित्काराने को मजबूर हो गया | कुछ है आप के अन्दर जो इस कदर निकलता है जिसके निशाँ मिटने का नाम नहीं लेती | एक लकीर खीच देती है आप हम पाठकों के मष्तिस्क में जिसकी प्रतिक्रया देने के लिए अनुकूल शब्द नहीं मिलते | बस इतना ही कहना है की बहुत खुबसूरत लगी आप की यह ये दर्द भरी कविता |
    कुछ बाते प्रिय पाठक के प्रतिक्रिया से ......
    ------------अनूप भार्गव जी ने लिखा है की आप के कविता में निराशा के भाव सिर्फ उन्हें ही नजर आता है या किसी और को भी. अनूप जी आप के साथ मै भी हू | जहां तक मै समझता हू ऐसी अनुभूती से ही इस कविता सी सार्थकता सिध्द होती है |
    ---------मोहिंदर कुमार जी को उर्दू के कुछ लफ्जों से निराशा उत्पन्न हुई | मोहिंदर जी छमा चाहुगा मै आप से सहमत नहीं हू | मुझे तो बहुत अच्छा लगा |
    ----------आकुल जी कुछ ज्यादा ही Reactive हो गए, ये आकुल जी का दोष नहीं कविता का असर है |
    और अंत में अजन्ता जी को पुन: बहुत शारी शुभकामनाएं .
    आर.पी. यादव

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  23. TARUN SHARMA (takeoff@indiatimes.com)March 13, 2010 at 9:17 AM

    DIDI,
    EXPRESSION BEYOND EXPLANATION. THAT'S ALL WHAT I CAN SAY ON THE MASTERPIECE THAT HAS APPEARD ALL THE WAY FROM YOUR PEN.
    KEEP WRITING..YOU HAVE MILES TO GO.....

    ALL THE BEST

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  24. Hi Ajanta, I visited your Blog this morning and found it very enjoyable. Your poetry was impressive and warm and thoughtful. I enjoyed every poem as it reminded me of the wandering of my own thoughts. Ajanta your poetry is just great and you are a talanted woman...... Simply Incredible!!!!

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  25. I visited your blog for the first time after responding to your request to be a friend on Face book. I am overwhelmed with your power of expression and maturity to compose poems . Please takeup membership of ekavita by applying to ekavita@yahoogroups.com and enjoy the daily presentations there as well as post your poems ,too. Your face-book friend Shree Amitabh Tripathi is also a member of that group and I am well known to him . In case help is needed please let me know .
    kamal

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  26. उफ्फ - दर्द का समंदर - मार्मिक तथा बहुत सुंदर - परिपक्व और उच्च स्तरीय रचना के लिए बधाई

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  27. Very interesting blog. A lot of blogs I see these days don't really provide anything that attract others, but I'm most definitely interested in this one. Just thought that I would post and let you know.

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