Sunday, June 7, 2009

जानवर से आदमी

जानवर से आदमी


एक जानवर
मेरे साथ रहता है.
मेरे बगल मे सोता है.
अपने बदन पर उगी हुई घासें दिखाकर
मुझे उससे चिपकने को कहता है.
उघरी हुई टाँगें दिखाता
पूरे घर में
इधर उधर फिरता रहता है.
सड़ी बदबूदार दांतों के बीच दबाकर
आधी चोकलेट मुझे काटने को कहता है.
अपने खुरदुरे हाथों से
मेरे गालों मे चिमटी काटकर
विजयरस का पान करता है.
चाय सुड़कता है.
चपर-चपर भात खाता है.
और थाली के एक कोने में
अपने मुँह से उगले फेन को
मेरे लिए छोड़ देता है.
जूते के फीते मुझसे बंधवाकर
बड़ी शान से टाई झुलाता
जब घर के बाहर निकलता है...
तब,
पता नही क्यों !
सब उसे
'आदमी' कहकर पुकारने लगते है !

32 comments:

  1. बस जैसे ही मेल मिला यहाँ आ गये, बहुत बढ़िया कविता पढ़वायी आपने। मन के भाव पर बन गये हैं

    --- आपका हार्दिक स्वागत है
    गुलाबी कोंपलें

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  2. Brilliant, Ultimate...superb !!
    आप बहुत अच्छा लिखती हैं

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  3. Hi Ajanta

    You are growing as a poetess with every new effort. Your poetry has sensitivity, depth and a beautiful expression. Ek typing error dikhi - सड़ी बदबूदार दांतों के बीच दबाकर kee jagha shayad सड़े बदबूदार दांतों के बीच दबाकर type hona thaa.

    Best wishes

    Tejendra Sharma
    Katha UK, London

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  4. जान+वर
    यूं ही जान

    से नहीं जुड़ा

    जान लेगा

    इसलिए है
    खड़ा।

    आदमी चाहे बन जाये

    पर आदमियत कहां से पाये।

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  5. अजंता जी,
    आपका मेल पढ़ते ही यह कविता पढ़ी, जाने ह्रदय में क्या दरक गया, कुछ बिदक गया और कुछ सिहर भी गया... हलचल मच गयी, सुनामी आ गयी भावनाओं की...
    लगभग दो माह के बाद एक तीक्ष्ण तीर छोडा है आपने...
    इसी वजह से आपका ढूंढ़ता था...
    संवेदनाओं को जागृत करने के लिए बधाइयां...

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  6. ajanta ji kis tarah aadmi ke sach ko shabdon me dhaalaa hai man me ek aseem vedana ne janm liyaa hai---itana gaharaa dard ---kavita man ko chhoo gayee ---

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  7. कविता ही हो

    सच्‍चाई न हो

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  8. aadmi aor janver me kuch anter aapko krna pdhega purus jo bhi krta hai nari ki khushi ke liye krta he dono ke smbandh se kevl nr ko santushti
    nhi milti nari bhi utni santusht hoti hai krpa vicarker bad ki santuchi per likhe
    us aadmi me hmara pita bhi hai jis hm vjud hai

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  9. अजंता में तुम्हें क्या कहूँ
    अपनी प्रिया सहेली
    या एक अनबूझ पहेली
    जितनी बार तुम्हारे बारे में
    सोचा है मैंने
    उतना ही हर बार प्यार और
    सम्मान दिया है मैंने
    शब्द तुम्हारी कविताओं में
    जलते ही अंगारे हैं
    स्याही के स्थान पे अपने
    ह्रदय रक्त से लिख मारे हैं

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  10. While reading i realised that there will be suspenseful revelation about who this animal is. And I wished dearly that you will reveal that its a dog (since i felt your words suffuged with slight hint of love)and not a man....but alas!

    It was a classic case of denying identity and truth, I knew the 'animalistic' vulgarity with which we carry ourselve unless we are called on to 'behave'like 'humans'.

    The poem is as simple and direct as Truth.
    Thanks for sharing,

    Bhole

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  11. Excellent poem! I am simply speechless. Its getting better and better.

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  12. प्यारी अजंता,
    अच्छा लिखी हो! हमेशा की तरह इस बार भी तुम्हारी लेखनी पैनी और धारदार है सचमुच आदमी की आदमियता चली जाये तो आदमी फिर आदमी कहाँ रह जाता वो तो फिर से आदम हो जाता है मांस खाने वाला जिसके शरीर में ढेर सारे बाल उगे होते हैं. अपनी कविताओं के माध्यम से तुमने मानव जाति की विभत्सता और दर्पमर्दन का सही चित्रण किया है.
    इसके लिए तुम्हें एकबार फिर मेरा स्नेह और आशीष.
    लिखती रहना...
    संजय कुमार सिंह

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  13. ajanta ji,
    bahut achchha!
    puri kavita ek jugupsit bhav paida karati hai| Manav ke nar me chhipe vaanar kI katha hai yah|
    vivashata ki peeda ka dansh, stree ki niyati isake anya upadan hain jahan se hokar gujarati hai yah kavita|
    badhaai
    amit

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  14. अजंता:
    कड़वाहट है कविता में लेकिन शायद समाज की सच्चाई भी । कभी यह भी सवाल उठे कि वह जानवर घर में रहता क्यों है ?

    स्नेह
    अनूप

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  15. ओढ़े हुए मुखौटे जब जब हट जाते हैं तब दिखता है
    आदि सत्य जिसको हम सब ही अक्सर झुठलाया करते हैं
    तथाकथित इक नई सभ्यता का जब लिपटा हुआ आवरण
    हट जाता है , सत्य देख तब बस स्तब्धित रह जाते हैं

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  16. I dont have much idea about poetry but i must say that it is the reality of life.

    Ajanta whatever you wrote ,you have done justice with that.

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  17. अजंता जी,
    आपकी यह रचना पढ़कर दो पल के लिए मुझे भी अपने 'आदमी' होने पर घृणा हो गयी! ये तो आपकी लेखनी का प्रभाव है.
    जब आदमी का रूप इतना घिनौना हो, तो उसे निर्लज्ज शब्दों में उकेरना भी आवश्यक हो जाता है.

    आशा है कभी किसी को ऐसे जानवर के साथ ना रहना पड़े!

    लिखती रहिए...

    सादर,
    प्रतीक

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  18. कविता अच्छी है.
    तीखापन, कसैलापन आवश्यकता से अधिक है. कथन यदि स्पष्टत:
    एकतरफ़ा मालूम पड़े तो असर कम हो जाता है. वैसे, कविता तो कल्पनात्मक अतिशयोक्ति से गुरेज़ करती ही नहीं. बिम्बों का सहारा ले कर कविता सशक्त होती है. बदन पर उगी घास का प्रयोग अच्छा है.
    निम्न अनुचित प्रतीत होता है—

    और थाली के एक कोने में
    अपने मुँह से उगले फेन को
    मेरे लिए छोड़ देता है.

    -ख़लिश

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  19. ये कहने का मन तो बिलकुल नहीं हो रहा की आपने बहुत अच्छी कविता लिखी है
    मन कड़वाहट से भर गया है
    हो सकेगा तो फिर से आकर इस कविता का कला पच्छ समझने की कोशिश करूंगा

    वीनस केसरी

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  20. कविता पढ़कर जो पहला शब्द मन में आया वह पहले ही कमेन्ट में प्रताप जी द्वारा प्रयुक्त हो चुका है --"वीभत्स"!
    कविता अच्छी है पर मुझे अच्छी नही लगी !

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  21. इस कविता का
    अच्‍छा न लगना
    ही है इसकी
    सफलता जनाब।

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  22. उद्वेलित करने वाली कविता है अतिरेक से पूर्ण.

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  23. pata nahi yeh bhav apke mann mein kahan se aya hai, agar yeh aap ki zindagi ka hissa hai tau mujhey iss ka ati khed hai ki aisa bhav aapke mann mein kaise aya, par yeh kisi ke jeevan ki sachai ho sakti parunta aaj ke yug mein nari aisi vibhastata ko nahi sehti,

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  24. Ajanta :

    As I read between every powerful word of your poem enriched with deepening thought ... I feel that you have justified the beast-ness in all..As soon as i reach the last line I couldn't stop myself from penning down my emotion .....

    As William Wordsworth rightly defined poetry as 'the spontaneous overflow of strong emotions'

    Poetry is the chiselled marble of language; it's a paint-spattered canvas - but the poet uses words instead of paint, and the canvas is us..

    Carefully selecting words for conciseness and clarity is standard, even for writers of prose, but poets go well beyond this, considering a word's emotive qualities, its musical value, its spacing, and yes, even its spacial relationship to the page. The poet, through innovation in both word choice and form, seemingly rends significance from thin air.

    'Poetry is artistically rendering words in such a way as to evoke intense emotion or an Ah Ha! experience from the reader'.

    I understand that you have painted radium on the beast inside everybody and manifested and symbolized the 'Janwar' as the 'animality' in 'aadmi' the human race....
    You have created a splendid blend of metaphors and symbols which gives a spark to the dampened thoughts of every reader

    As a post modern reader of your blog I feel that 'Janwar se AAdmi' is one of the most awe inspiring poem..... I still cant stop thinking.....

    An understanding for all:

    Don't shackle poetry with your definitions. Poetry is stronger than you think. Poetry is imagination and will break those chains faster than you can say...

    Love for all Readers,
    KH

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  25. I read lot of comments for this poem in your blog. I liked reading the comments from different minds. I believe these comments will even make sharper your poetic bent of mind and come out with more poweful words....that will instil love, peace and sacrifice...in a Man or in human. Ultimately a man can not be a man without these qualities..Probably, this is what your poem also trying to justify to the society at large but indirectly which is lacking in your man for U..

    Please see few words from my side..

    कविता अच्छी है पर वो आदमी अच्छा नहीं है.!!! यह आदमीयत और उसके सब्भयता पर ब्यंग भी है. पर मुस्किल की बात है की ऐसी छबि उसकी क्यों है जो आदमी के रूप में जानवर ही है. यह संभव भी है. आदमी कूछ भी कर सकता है और सोच सकता है, जानवर तो फिर भी अच्छा होता है.आदमी तो राक्षस भी हो जाता है. अभिरंजन कुमार की एक पंक्ति याद आ गई - कुत्तों ने तो अपना कुत्तापना आज भी नहीं छोड़ा है, लेकिन आदमीयत बार-बार खंडित हुई है। इसमे कोई अतिशयोक्ति नहीं है. कविता का भाव घृणा और आक्रोश है.

    स्त्री हो या पुरुष कमिया (जानवर) सभी के अंदर कम बेसी होती हैं. अच्छाइयाँ दूसरोंके लिए प्रेरणा ना बन सके तो अपनी अच्छाइयों का अहम भी नहीं होना चाहिए. जीवन मे अच्छाइयाँ और सरलता दोनो हो और घृणा लेश मात्र भी ना हो और अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितियों मे अपने - अपने कर्तब्यो को भली भाँति निभाते हुए समता रखने की क्षमता हो तो शायद दूसरे भी अनुकरण करें और जीवन मे परिवर्तन की सम्भावना है. मेरी ईश्वर से प्रार्थना है की प्रस्तुत कविता केवल प्रेरणा का ही स्रोत बने. जिस समाज मे स्त्रियों का सम्मान नहीं वह समाज कभी उन्नत नहीं हो सकता.

    शिव प्रकाश

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  26. कविता की सबसे ख़ूबसूरत पहलू सामान्य बोलचाल की घरेलू भाषा है | आप का यह प्रयास उन लोगों को भी खीच लिया है जो हिन्दी साहित्य के विद्वान् नहीं है और काम चलाऊ हिन्दी जानते है | क्लिष्ट शब्दों के द्वारा अपनी विद्वता और विचारों को थोपने वाले लेखकों के लिए यह एक ख़ूबसूरत नमूना है |
    कविता की दूसरी खूबसूरती बातों का एक ऐसा क्रम है जिसमे पाठक एक वाक्य पड़ने के बाद दूसरा वाक्य पड़ने को व्याकुल हो जाता है |
    कविता की तीसरी खूबसूरती इसका suspense है जहा पाठक के मन में एक घरेलू और पालतू जानवर ( मुख्यत: कुत्ते ) की तस्वीर बनती है और अंतिम वाक्य के पहले तक कही गयी सारी पंक्तियां इसी के अनुकूल होती है | पाठक को धक्का तब लगता है जब वह कविता का आख़िरी वाक्य " 'आदमी' कहकर पुकारने लगते है !"
    पर आता है | यही पर suspense भी ख़त्म हो जाता है |
    यह छोटी सी रचना जितनी interesting है उतनी ही असरदार भी | कविता जानवर के बहाने पुरुष पर बहुत तेज वार करता है जिसके कारण पाठक अपने को अपमानित महसूस करता है | कविता एक x-rays का काम करता है जिसमें पुरुष के अन्दर का जानवर दिखाई देने लगता है | हां यह हो सकता है कि किसी में जानवर की तस्वीर धुधली है तो किसी में स्पष्ट और किसी में बिलकुल नहीं | लेखक ने स्पष्ट रूप से यह नही कहा है कि जानवर सिर्फ पुरुष के अन्दर ही होता है किन्तु उसकी उंगली पुरुष के तरफ ही इशारा करती है | लेखक को यह स्वीकार्य करना होगा कि जानवर, पुरुष और स्त्री दोनों में हो सकता है |

    रचना अपनी उद्देश्य में पूर्ण रूप से सफल है | यदि हमारे अंदर कोइ जानवर है तो इसके लिए लेखक पर नाराज होने से ज्यादा जरूरी उसे बाहर निकालना है |

    इतनी ख़ूबसूरत कविता के लिए बहुत बहुत बधाईयाम |

    -----रोहित----

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  27. यह कविता आदमी की उसी संकीर्ण मानसिकता को प्रतिबिंबित करती है, जहां वह स्त्रियों को आज भी दासत्व की अपनी ओछी और गंदी सोंच से मुक्त नहीं कर पाया है। गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई मध्यमवर्गीय भारतीय स्त्री, आज भी संस्कारों का चोला ओढ़े हुये पुरूष समाज से अपनी स्वतंत्रता की गुहार कर रही है, लेकिन इस संवेदनहीन सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करने वाले पुरूष वर्ग को इसकी फिक्र भला कैसे हो सकती है? हो सकता है, पुरूष प्रधान समाज में अपने दंभ को सन्तुष्ट करने की आवश्यकता उसे ऐसी ओछी हरकत को विवश करती हो, लेकिन ऐसे धृणित पुरातनपंथी विचारों को त्यागने का वक्त अब आ चुका है, अन्यथा यदि स्त्रियों के क्रोध का आवेग जब ज्वालामुखी बनकर फूटेगा तो कहीं समाजिक स्वरूप के अर्थहीन और विकृत हो जाने का खतरा ना उत्पन्न हो जाये।

    वैसे भी एक पुरूष की हां में हां मिलाकर, अब हर मां का अपने संतान के रूप में पुत्र की चाह मेरे विचार से कहीं ना कहीं उस डर को प्रतिबिंबिंत करती है जहां उसे लगने लगा है, कि उसकी बेटी को कहीं वह सजा ना भोगना पड़े जो उसने बर्दाश्त की है, बेटियो के प्रति स्त्रियो की बढती अनिच्छा का शायद यही एक कारण है । उत्तर के कई राज्यों में बालिकाओं की घटती संख्या (कई राज्यो मे तो यह ८५० के करीब आ चुका है) इसके प्रमाण है। कल्पना की जा सकती है कि जब स्त्रियों की संख्या पुरूषो की आधी हो जायेगी तो समाज का स्वरूप कैसा वीभत्स होगा ।

    मैं मानता हूं कि किसी स्त्री के मर्यादित आचरण को उसकी कमजोरी नही समझी जानी चाहिये, प्रतिरोध का प्रक्रिति प्रदत्त गुण उसमे भी विद्यमान है लेकिन किसी मा के सन्सकार उसे उसकी इजाजत नही देती.

    किसी स्त्री को चौखट के भीतर एक दासी का स्वरूप प्रदान करने की पुरूषो की गंदी सोंच की कोई भारी कीमत समाज को भविष्य मे कहीं चुकाना ना पड़ जाये इसलिये भी अब समाज में एक जागृति की जरूरत है अन्यथा जब हम जागे तो कही बहुत देर ना हो जाये.

    कवियित्री भी अपनी रचना के माध्यम से शायद यही संदेश देना चाहती हैं ।

    सादर

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  28. Hi Ajanta,

    I have been waiting eagerly for your next poem.

    It has been two months since you have posted your extra-ordinary, reality lit poem 'Janwar se Admi'.It created a stir in the soul of the all the readers. But as time is passing by your readers are thirsty for something new now....

    With the onset of monsoon and romantic milieu ......it gives a tantalizing feeling of love and romance , please can you gift your readers with a romantic poem which would compliment the feeling in the air...

    With love and regards
    KH

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  29. बहुत ही संवेदनशील रचना है ...एक एक शब्द अपनी व्यथा कह रहे हैं...सुन्दर ..

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  30. अजन्ता जी कविता का उद्देश्य जब सिर्फ़ कविता लिखना रह जायेगा तब ऐसी ही कविताये लिखी और सराही जायेन्गी. ये कहने पर की क्या ये आपके साथ बीता सच है आप बहुत सफ़ाई से कह देन्गी कि कविता कवि की कल्पना होती है और मै भी इससे सहमत हू लेकिन कैसी बीभत्स कल्पना की है और सच कह दू कल्पना नही की है एक कुत्ते की गतिबिधिया साम्ने रही है और अन्त मे़ उसे आदमी का नाम दे दिया है.

    आपकी लेखन प्रतिभा को सलाम करते हुए भी ये आग्रह है कि हो सके तो कविता सत्यम शिवम सुन्दरम की झलक दिखाये लेकिन ऐसा न हो तो भी असत्य का सहारा ना ले.

    तमाम शुभकामना के साथ

    हरि शर्मा
    http://hariprasadsharma.blogspot.com/

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  31. सन्दर्भ - "ये कहने पर की क्या ये आपके साथ बीता सच है आप बहुत सफ़ाई से कह देन्गी कि कविता कवि की कल्पना होती है और मै भी इससे सहमत हू लेकिन कैसी बीभत्स कल्पना की है" -----
    आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई रचनाएँ प्रायः पाठकों के मन में भ्रम उत्पन्न कर देती हैं कि कहीं लेखक/कवि ने आपबीती तो नहीं लिखी है. यह सोच और भी प्रखर हो जाती है यदि कविता का स्तर वह हो जो अजन्ता जी की कविताओं का होता है. वे जब प्रहार लिखती हैं तो हृदय लहूलुहान हो जाता है और जब प्यार लिखती हैं तो नेह का समंदर उमड़ पड़ता है.
    कवि जो कुछ भी लिखता है उसमे उसकी स्वयं की अनुभूतियाँ और विचारों के अतिरिक्त समाज और आस पास के परिवेश में घटित घटनाओं का एक बहुत बड़ा योगदान होता है. यह रचना एक बहुत ही तीखा व्यंग है. व्यंग में कल्पना नहीं होती है.
    यह आवश्यक नहीं कि कुछ लिखने के लिए भुग्त भोगी होना पड़े. कोई भी घटना जो कवि के इर्द गिर्द घटती है और उसकी भावनाओं को उद्वेलित करती है तो वह उन्ही भावनाओं को अपने शब्दों में पिरोकर कविता निर्मित करता है.
    इस कविता में जो कुछ कहा गया है उस स्थिति से हर नारी नहीं गुजरती है और न ही हर पुरुष ही इस तरह का होता है. किन्तु कुछ नारियाँ तो ऐसी अवश्य हैं जो ऐसी परिस्थितियों से गुजरती हैं. कुछ तो पुरुष ऐसे हैं जो मानवीय सीमाओं को लाघने में जरा सा भी संकोच नहीं करते.जो इस कविता के सृजन के आधार बने.
    एक सच्ची और धारदार रचना के लिए बधाई !!!
    "हंस" में इसे पढ़कर ख़ुशी हुई.

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