Friday, October 21, 2011

पल भर का ग्रहण : : हिंदी कविता


तुम्हें
जिस दिन अपनी गलियों से गुज़रते देखा था,
मेरा दहकता धर्म
गंगोत्री के चरण धर
सुरसरी संग बहने की इच्छा करने लगा था.
 
मैं सूर्य हूँ.
अपने आकाश में आंखें तरेरे
आग उड़ेले
अडिग बन
छड़ी की नोक पर
सर्वत्र धमकती फिरती हूँ.
 
किंतु,
हे धवल बादल !
उस दिन
जब तुम्हें बहता देखा था मैंने,
चाहा था
तुम्हारे फाहों में एकबार मुंह छुपा
खुद को संतापहीन  कर  लूं,
अपनी अकड़ का सारा ताप झर दूं.
 
मैं बन जाऊं एक बालक,
और बना लूं तुम्हें
अपने घर के अहाते का एक अनदेखा कोना
जिसमें छुप
मैं दुनिया भर के विषादों से लिपटे कागज़ का
एक पेपर प्लेन बनाऊं.
एक नाव
जिसमे अपनी मासूमियत तैराऊँ.
तुम्हीं बताओ !
अपने अस्तित्व का यह कोमल पक्ष
मैं और कित लेकर जाऊं?
 
हाँ ! मैं हूँ सूर्य !
करती नेतृत्व
रहती अविजित
अपार ऊर्जा निहित.
 
पर,
मेरे एकमात्र शीतल बादल !
क्या तुम नहीं थामोगे मेरी विनम्रता भी ?
मेरे चेहरे की मलीनता,
क्षण भर की क्षीणता भी ?
क्या नहीं है तुम्हें
मेरी एक दुबकी हुई कुंठा स्वीकार्य?
क्या न होगा तुम्हें
मेरे पल भर का भी ग्रहण
ग्राह्य?


-अजन्ता

16 comments:

  1. Need to have a very deep thought process to jaw down these words!!!!!

    ReplyDelete
  2. भावों की गहन अभिव्यक्ति सुंदर अतिसुन्दर बधाई की परिधि से बाहर

    ReplyDelete
  3. khoobsoorat ...man vaakaee kitni baaten kar leta hai ...

    ReplyDelete
  4. after first reading, such poems needs to be read again and again.. every time it is more meaningful!

    keep writing :-)

    ReplyDelete
  5. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  6. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  7. ...main ban jaau ek baalak... amazing imagination! The visual it creates, is so comforting and soothing. I always like your poetry in parts - those that I am able to understand :-). Then I wonder - if parts of your poem are so beautiful, the whole would definitely be spellbinding. I also wonder about the identity of that baadal... ;-)
    Your ability to 'realise' the gist of your words in paint and pencil, is indeed commendable - lends a totally new dimension to the kavita. Congratulations!

    ReplyDelete
  8. ओह ! कितना मोहक ! अप्रतिम !

    मेरा दहकता धर्म........ कितना सुन्दर प्रयोग !
    गंगोत्री के चरण धर
    सुरसरी संग बहने की इच्छा करने लगा था...... अनुपम !
     
    तुम्हारे फाहों में एकबार मुंह छुपा
    खुद को संतापहीन कर लूं,
    अपनी अकड़ का सारा ताप झर दूं..... कितना मर्म है इन पंक्तियों में !
     
    "मैं बन जाऊं एक बालक,
    और बना लूं तुम्हें
    अपने घर के अहाते का एक अनदेखा कोना
    जिसमें छुप
    मैं दुनिया भर के विषादों से लिपटे कागज़ का
    एक पेपर प्लेन बनाऊं.
    एक नाव
    जिसमे अपनी मासूमियत तैराऊँ"........ ओह ! कितनी उत्कता ! कितनी लालसा !

    "क्या तुम नहीं थामोगे मेरी विनम्रता भी ?
    मेरे चेहरे की मलीनता,
    क्षण भर की क्षीणता भी ?
    क्या नहीं है तुम्हें
    मेरी एक दुबकी हुई कुंठा स्वीकार्य?
    क्या न होगा तुम्हें
    मेरे पल भर का भी ग्रहण
    ग्राह्य?"........ इन पंक्तियों के लिए क्या कहूँ. नि:शब्द हूँ.

    ReplyDelete
  9. मैं सूर्य हूँ.
    अपने आकाश में आंखें तरेरे
    आग उड़ेले
    अडिग बन
    छड़ी की नोक पर
    सर्वत्र धमकती फिरती हूँ.

    ...सुन्दर बिम्ब देखने को मिले ..
    सुन्दर सार्थक प्रस्तुति मन को बहुत अच्छी लगी
    हार्दिक शुभकामनायें!.

    ReplyDelete
  10. sorry ........I am coming late here......
    पर,
    मेरे एकमात्र शीतल बादल !
    क्या तुम नहीं थामोगे मेरी विनम्रता भी ?
    मेरे चेहरे की मलीनता,
    क्षण भर की क्षीणता भी ?
    क्या नहीं है तुम्हें
    मेरी एक दुबकी हुई कुंठा स्वीकार्य?
    क्या न होगा तुम्हें
    मेरे पल भर का भी ग्रहण
    ग्राह्य?..........bahut hi achchi line....aur ek kuch sandesh dete hue....thanks.......

    ReplyDelete
  11. sundar, kintu ...

    ReplyDelete
  12. जब तुम्हें बहता देखा था मैंने,
    चाहा था
    तुम्हारे फाहों में एकबार मुंह छुपा
    खुद को संतापहीन कर लूं,
    अपनी अकड़ का सारा ताप झर दूं.
    ...
    एक नाव
    जिसमे अपनी मासूमियत तैराऊँ.
    तुम्हीं बताओ !
    अपने अस्तित्व का यह कोमल पक्ष
    मैं और कित लेकर जाऊं?
    - प्रखरता और कोमलता का संघात ऐसे ही प्रश्नों में सामने आ खड़ा होता है.

    ReplyDelete
  13. There is so much depth in your writings I wish you all the good luck. Keep the good work going.

    ReplyDelete
  14. Ajanta aapki kavitaon mai aap aapki kalpana un kavitaon ko is gahraaie tak le jati hai ki man karta hai ki in mai hamesha ke liye doobe rahai.

    Kalpana kie in udano ko aur oochaiyo par le jao ye hamarie dua hai.

    ReplyDelete
  15. respected "kintu" ma'm ....

    अशेष समर्पण , “दलित-द्राक्षा की भांति खुद को निचोड़ कर” दे देने की एक व्यग्र कामना , जो पूरी न हो कर अन्ततः एक टीस सी बन जाती है ,बार बार आपकी कविताओं में अलग अलग गहन , मूर्ति जैसे गढ़े गये बिम्बों में अभिव्यक्त होती है , ऐसा मैं समझ पाता हूं.

    ReplyDelete