Monday, March 30, 2009

उत्तर


उत्तर


मरिचिका से भ्रमित हो
वह प्रश्न कर बैठे हैं
थोडा पास आकर देखें
जीवन बिल्कुल सपाट है

अपने निष्टुर आंखों से
जो आग उगलते रहते हैं
उनपर बर्फ सा गिरता
मेरा निश्छल अट्टहास है

जीवन ने फल जो दिया
वह अन्तकाल मे नीम हुआ
उसे निगल मुस्काती अपने
रिश्ते की मिठास है

6 comments:

  1. लाजवाब रचना ....बेहतरीन भाव लिए हुए ....कैसे तारीफ करूँ

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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  2. जीवन ने फल जो दिया
    वह अन्तकाल मे नीम हुआ
    उसे निगल मुस्काती अपने
    रिश्ते की मिठास है
    Bahut sundar bhavnatmak kavita ...
    Ajanta ji ,
    apko hardik badhai.
    Poonam

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  3. एक स्त्री के मनोभावो का बहुत सुन्दर चित्रण,एक भारतीय औरत की यह वास्तविक मनोदशा है कि वह वैवाहिक जीवन मे अपने ऊपर बीत रहे किसी भी दुख के पलो से निकली व्यथा के क्षणो को घर की देहरी से बाहर नही निकलने देती, इसे उसकी महानता कहा जाये या उसके सन्सकार या फिर उसकी कमजोरी.

    परन्तु मेरा यह सदैव मानना होता है कि औरत कभी कमजोर नही होती, जो दूसरो को जीवन भर शक्ति प्रदान करती हो वह भला कमजोर कैसे हो सकती है? यह तो उसके सन्सकार और बडप्पन है जो दर्द सहकर भी कभी उफ नही करती.मै हर ऐसी औरत के बडप्पन को नमन करता हू.

    लेकिन समझने की जरुरत वास्तविक रूप से उस पुरूष समाज को है जो उस समीप मे रखी पारस रूपी स्त्री की तो कद्र नही कर पाता लेकिन स्वर्ण के लिये जीवन भर गलियो, चौराहो मे भटकते रहता है.

    एक ऐसी औरत की व्यथा को बखूबी कम शब्दो मे सारगर्भित रूप से चित्रित करने और उसे अपने कलम से पन्क्तियो मे उतारने के लिये आपको हार्दिक बधाई और ढेरो शुभकामनाये.और हा आपके बहुत सुन्दर स्केच के लिये भी बधाई.

    सादर
    राकेश

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  4. सुन्दर भाव अभिव्यक्ति.. इसी तरह लिखती रहिये..

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  5. बहुत ही बेहतरीन !!!
    अजन्ता जी , आपके शब्द कागज़ पर बनी हुयी नियम बद्ध आकृतियाँ नहीं वरन समय , समाज और मानवीय रिश्तों के मस्तक पर लिखे लिए गए शिलालेख होते हैं .
    बहुत बहुत बधाई !!!!

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