Friday, October 21, 2011

पल भर का ग्रहण : : हिंदी कविता


तुम्हें
जिस दिन अपनी गलियों से गुज़रते देखा था,
मेरा दहकता धर्म
गंगोत्री के चरण धर
सुरसरी संग बहने की इच्छा करने लगा था.
 
मैं सूर्य हूँ.
अपने आकाश में आंखें तरेरे
आग उड़ेले
अडिग बन
छड़ी की नोक पर
सर्वत्र धमकती फिरती हूँ.
 
किंतु,
हे धवल बादल !
उस दिन
जब तुम्हें बहता देखा था मैंने,
चाहा था
तुम्हारे फाहों में एकबार मुंह छुपा
खुद को संतापहीन  कर  लूं,
अपनी अकड़ का सारा ताप झर दूं.
 
मैं बन जाऊं एक बालक,
और बना लूं तुम्हें
अपने घर के अहाते का एक अनदेखा कोना
जिसमें छुप
मैं दुनिया भर के विषादों से लिपटे कागज़ का
एक पेपर प्लेन बनाऊं.
एक नाव
जिसमे अपनी मासूमियत तैराऊँ.
तुम्हीं बताओ !
अपने अस्तित्व का यह कोमल पक्ष
मैं और कित लेकर जाऊं?
 
हाँ ! मैं हूँ सूर्य !
करती नेतृत्व
रहती अविजित
अपार ऊर्जा निहित.
 
पर,
मेरे एकमात्र शीतल बादल !
क्या तुम नहीं थामोगे मेरी विनम्रता भी ?
मेरे चेहरे की मलीनता,
क्षण भर की क्षीणता भी ?
क्या नहीं है तुम्हें
मेरी एक दुबकी हुई कुंठा स्वीकार्य?
क्या न होगा तुम्हें
मेरे पल भर का भी ग्रहण
ग्राह्य?


-अजन्ता

Monday, September 26, 2011

स्ट्रगल फॉर एग्जिस्टेन्स : हिंदी कविता

(Struggle for Existence **)

हथेलियों का अपमान
मेरे गालों पर
अब नहीं जड़ता,
न हीं
अवसादों का कीचड
मेरे वस्त्र को गंदा करता है.
तिरस्कार की चटनी से
मेरी थाल सज जाती है,
मुट्ठी भर घृणा से
मेरा पेट भर जाता है.
अपशब्दों का आब
मेरी तृष्णा को पर्याप्त है,
फब्तियां कसती खिड़कियाँ हैं,
अवहेलित करता चारदीवार है.
गुर्राती शाम की सांकलें हैं,
बदबू मारती रात है.
ठेल, धकेल,
और फर्श की बर्फ,
मेरी रोज की नींद का सामान है.
 

मूलतः
मैं सजीव हूँ.
संवेदनाविहीन,
पर  सक्रिय हूँ.
विषम परिस्थितियों में
सिद्धांतों को प्रतिपादित करती,
बिनलुप्त,
कठजीव हूँ.


-अजन्ता


[** 'स्ट्रगल फॉर एग्जिस्टेन्स' (Struggle for Existence) शब्द , महान वैज्ञानिक डार्विन के विकासवाद का एक सिद्धांत है जो उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ऑरिजिन ऑफ स्पीसीज़ (Origin of Species) से लिया गया है .]