मल्हार
अचानक
किसी बसंती सुबह
तुम गरज बरस
मुझे खींच लेते हो
अंगना में .
मैं तुममें
नहा लेने को आतुर
बाहें पसारे
ढलक जाती हूँ .
मेरा रोम रोम
तुम चूमते हो असंख्य बार .
अपने आलिंगन में
भिगो देते हो
मेरा पोर पोर.
मेरी अलसाई पलकों पर
शीत बन पसर जाते हो.
माटी के बुलबुलों में छुपकर
मेरी पायल का
उन्माद थामते हो.
मेरा हाथ पकड़
जिस डार तले
तुम खींचते हो,
उसकी कनखियों से
मैं लजा जाती हूँ.
नाखूनों से खुरचती हूँ
जमीन.
और हाथ पसार
कुछ मुक्ता जुटाती हूँ.
शिख नख
तुम ह्रदय बन झरते हो.
मुझे हरते हो .
बारिश संग
जब
तुम बरसते हो.
-अजन्ता
अचानक
किसी बसंती सुबह
तुम गरज बरस
मुझे खींच लेते हो
अंगना में .
मैं तुममें
नहा लेने को आतुर
बाहें पसारे
ढलक जाती हूँ .
मेरा रोम रोम
तुम चूमते हो असंख्य बार .
अपने आलिंगन में
भिगो देते हो
मेरा पोर पोर.
मेरी अलसाई पलकों पर
शीत बन पसर जाते हो.
माटी के बुलबुलों में छुपकर
मेरी पायल का
उन्माद थामते हो.
मेरा हाथ पकड़
जिस डार तले
तुम खींचते हो,
उसकी कनखियों से
मैं लजा जाती हूँ.
नाखूनों से खुरचती हूँ
जमीन.
और हाथ पसार
कुछ मुक्ता जुटाती हूँ.
शिख नख
तुम ह्रदय बन झरते हो.
मुझे हरते हो .
बारिश संग
जब
तुम बरसते हो.
-अजन्ता
