(८ मार्च - महिला दिवस के अवसर पर )
पूर्णतुम मुझसे डरो !
क्योंकि मैं खुद को रोकना नहीं जानती.
तुम मुझसे डरो !
क्योंकि मैं समस्याओं के टीले पर खडी होकर भी
उन्मादित हो हंसती हूँ.
तुम डरो !
क्योंकि तुम्हारे लाख मारने पर भी
मैं ’कुछ’ प्रसंगों को पल-पल जीती हूँ.
तुम चाहते हो मैं रोती रहूँ.
सुबकती जीऊँ.
हारकर तुम्हें अपनी जरूरत बताऊँ
पर
तुम अब डर जाओ.
क्योंकि, मैं तुम्हारे अनुमान से भी आगे हूँ.
मैं क्षितिज तक जाकर इन्द्रधनुष में छिटकी हूँ.
मैं बह रही हूँ.
मैं कह रही हूँ.
मैं हूँ अपने हीं प्रश्नों का उत्तर.
मैँ अपनी सहेली आप हूँ.
मैं मुझ संग प्रेम प्रलाप हूँ.
-अजन्ता