Thursday, December 4, 2008

आस



आस

बड़ी आस थी
उनदिनों,
के मेरे ज्वलंत मस्तक पर
तुम अपने होंठों से ठंडी ओस मलते,
और
मेरी समस्याएं
छनछनाकर भाप बन उड़ जातीं.
तुम्हारी बाहों में
मेरा हर भार होता
और मैं पेंग बढाकर
आसमान तक हो आती.
तुम्हारे वक्ष की गरमाहट
मुझे बर्फ न बनने देता.
मैं पानी होती
मुझमे भी जीवन होता.
बड़ी आस थी उनदिनों,
के तुम होते.
आस
अब भी जीवित है.
क्या तुम
कभी होगे?

5 comments:

  1. KOI NA KOI AISA KAHIN NA KAHIN ZAROOR HOGA JO TUMHARI HAR SAMASYA KO BHAAP BANA URRA DE.

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  2. अजन्ताजी,
    अगला कविता के लिए इंतजार कर रहा हूँ !

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  3. भावनाओं की इतनी गहराई .....आपकी आस से दो चार हुआ ....कविता बहुत अच्छी लगी पढ़कर

    अनिल कान्त
    मेरा अपना जहान

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  4. बहुत भीतर से निकले है ये शब्द , शानदार !

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