
आस
बड़ी आस थी
उनदिनों,
के मेरे ज्वलंत मस्तक पर
तुम अपने होंठों से ठंडी ओस मलते,
और
मेरी समस्याएं
छनछनाकर भाप बन उड़ जातीं.
तुम्हारी बाहों में
मेरा हर भार होता
और मैं पेंग बढाकर
आसमान तक हो आती.
तुम्हारे वक्ष की गरमाहट
मुझे बर्फ न बनने देता.
मैं पानी होती
मुझमे भी जीवन होता.
बड़ी आस थी उनदिनों,
के तुम होते.
आस
अब भी जीवित है.
क्या तुम
कभी होगे?
बड़ी आस थी
उनदिनों,
के मेरे ज्वलंत मस्तक पर
तुम अपने होंठों से ठंडी ओस मलते,
और
मेरी समस्याएं
छनछनाकर भाप बन उड़ जातीं.
तुम्हारी बाहों में
मेरा हर भार होता
और मैं पेंग बढाकर
आसमान तक हो आती.
तुम्हारे वक्ष की गरमाहट
मुझे बर्फ न बनने देता.
मैं पानी होती
मुझमे भी जीवन होता.
बड़ी आस थी उनदिनों,
के तुम होते.
आस
अब भी जीवित है.
क्या तुम
कभी होगे?
KOI NA KOI AISA KAHIN NA KAHIN ZAROOR HOGA JO TUMHARI HAR SAMASYA KO BHAAP BANA URRA DE.
ReplyDeleteअजन्ताजी,
ReplyDeleteअगला कविता के लिए इंतजार कर रहा हूँ !
post your new poems.
ReplyDeleteभावनाओं की इतनी गहराई .....आपकी आस से दो चार हुआ ....कविता बहुत अच्छी लगी पढ़कर
ReplyDeleteअनिल कान्त
मेरा अपना जहान
बहुत भीतर से निकले है ये शब्द , शानदार !
ReplyDelete
ReplyDeleteI just read you blog, It’s very knowledgeable & helpful.
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