Wednesday, January 23, 2008

कुछ यूँ हीं...

जिन्दगी चल ! तुझे बांटती हूँ
उनसे कट कर, खुद को काटती हूँ

कितनों में जिया, कितनों ने मारा मुझे
लम्हों को कुछ इस तरह छांटती हूँ

ठूंठ मे बची हरी टहनियां चुनकर
नाम उनका ले, ज़मीं में गाडती हूँ

जिन्दगी चल ! तुझे बांटती हूँ...

2 comments:

  1. A pearl of a poem! I loved it. Keep it up Ajanta!

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