जानवर से आदमी
एक जानवर
मेरे साथ रहता है.
मेरे बगल मे सोता है.
अपने बदन पर उगी हुई घासें दिखाकर
मुझे उससे चिपकने को कहता है.
उघरी हुई टाँगें दिखाता
पूरे घर में
इधर उधर फिरता रहता है.
सड़ी बदबूदार दांतों के बीच दबाकर
आधी चोकलेट मुझे काटने को कहता है.
अपने खुरदुरे हाथों से
मेरे गालों मे चिमटी काटकर
विजयरस का पान करता है.
चाय सुड़कता है.
चपर-चपर भात खाता है.
और थाली के एक कोने में
अपने मुँह से उगले फेन को
मेरे लिए छोड़ देता है.
जूते के फीते मुझसे बंधवाकर
बड़ी शान से टाई झुलाता
जब घर के बाहर निकलता है...
तब,
पता नही क्यों !
सब उसे
'आदमी' कहकर पुकारने लगते है !
Sunday, June 7, 2009
Monday, April 6, 2009
दूरियां
दूरियां
मैं चली जाऊँ तो निराश मत होना.
जीना ही तो है!
एक सीधा-सा प्रश्न
एक अटपटा-सा उत्तर.
अपने अगले पलों में छिपाकर रखूँगी मैं तुम्हें
और तुम मुझे रखना.
मौका पाते ही
उन निधियों के हम सामने रख खोला करेंगे.
उनके रहते ना मेरी रातें स्याह होगी
ना तुम्हारे दिन तपे हुए.
ये पल ही होगा
कभी शीतल
कभी चाँद.
मैं चली जाऊँ तो उदास मत होना कभी,
मुड़कर देखना
रास्ते में चलते हुए
मैं
खड़ी
हाथ हिलाती
नज़र आऊँगी।
मैं चली जाऊँ तो निराश मत होना.
जीना ही तो है!
एक सीधा-सा प्रश्न
एक अटपटा-सा उत्तर.
अपने अगले पलों में छिपाकर रखूँगी मैं तुम्हें
और तुम मुझे रखना.
मौका पाते ही
उन निधियों के हम सामने रख खोला करेंगे.
उनके रहते ना मेरी रातें स्याह होगी
ना तुम्हारे दिन तपे हुए.
ये पल ही होगा
कभी शीतल
कभी चाँद.
मैं चली जाऊँ तो उदास मत होना कभी,
मुड़कर देखना
रास्ते में चलते हुए
मैं
खड़ी
हाथ हिलाती
नज़र आऊँगी।
Monday, March 30, 2009
उत्तर
Saturday, March 7, 2009
पूर्ण
(८ मार्च - महिला दिवस के अवसर पर )
पूर्ण
तुम मुझसे डरो !
क्योंकि मैं खुद को रोकना नहीं जानती.
तुम मुझसे डरो !
क्योंकि मैं समस्याओं के टीले पर खडी होकर भी
उन्मादित हो हंसती हूँ.
तुम डरो !
क्योंकि तुम्हारे लाख मारने पर भी
मैं ’कुछ’ प्रसंगों को पल-पल जीती हूँ.
तुम चाहते हो मैं रोती रहूँ.
सुबकती जीऊँ.
हारकर तुम्हें अपनी जरूरत बताऊँ
पर
तुम अब डर जाओ.
क्योंकि, मैं तुम्हारे अनुमान से भी आगे हूँ.
मैं क्षितिज तक जाकर इन्द्रधनुष में छिटकी हूँ.
मैं बह रही हूँ.
मैं कह रही हूँ.
मैं हूँ अपने हीं प्रश्नों का उत्तर.
मैँ अपनी सहेली आप हूँ.
मैं मुझ संग प्रेम प्रलाप हूँ.
-अजन्ता
पूर्ण
तुम मुझसे डरो !
क्योंकि मैं खुद को रोकना नहीं जानती.
तुम मुझसे डरो !
क्योंकि मैं समस्याओं के टीले पर खडी होकर भी
उन्मादित हो हंसती हूँ.
तुम डरो !
क्योंकि तुम्हारे लाख मारने पर भी
मैं ’कुछ’ प्रसंगों को पल-पल जीती हूँ.
तुम चाहते हो मैं रोती रहूँ.
सुबकती जीऊँ.
हारकर तुम्हें अपनी जरूरत बताऊँ
पर
तुम अब डर जाओ.
क्योंकि, मैं तुम्हारे अनुमान से भी आगे हूँ.
मैं क्षितिज तक जाकर इन्द्रधनुष में छिटकी हूँ.
मैं बह रही हूँ.
मैं कह रही हूँ.
मैं हूँ अपने हीं प्रश्नों का उत्तर.
मैँ अपनी सहेली आप हूँ.
मैं मुझ संग प्रेम प्रलाप हूँ.
-अजन्ता
आईना
Tuesday, March 3, 2009
एकाकार
एकाकार
एक आकार बन
मेरे मानस में तुम्हारा स्थापन
मुझे ठहरा गया है.
न अब कोई प्रतीक्षा है.
न भय है तुम्हारे जाने का.
मेरी दीवारें भी
अब तुम्हें खूब पहचानती हैं
महका करती हैं वो
तुम्हारी खुश्बू की भांति
और मुझे नहलाती है.
मेरी बन्द पलकों पर
वायु का सा एक थक्का
जब
तुम - सा स्पर्श करने को
मांगता है मेरी अनुमति,
मैं सहज हीं सर हिला देती हूँ
मेरे सार में
विलीन हो जाता है,
तुम्हारे अहसास और आवश्यकता का अनुपात.
अब तुम सदा मेरे पास हो,
उदभव से लेकर,
समाहित होने तक.

एक आकार बन
मेरे मानस में तुम्हारा स्थापन
मुझे ठहरा गया है.
न अब कोई प्रतीक्षा है.
न भय है तुम्हारे जाने का.
मेरी दीवारें भी
अब तुम्हें खूब पहचानती हैं
महका करती हैं वो
तुम्हारी खुश्बू की भांति
और मुझे नहलाती है.
मेरी बन्द पलकों पर
वायु का सा एक थक्का
जब
तुम - सा स्पर्श करने को
मांगता है मेरी अनुमति,
मैं सहज हीं सर हिला देती हूँ
मेरे सार में
विलीन हो जाता है,
तुम्हारे अहसास और आवश्यकता का अनुपात.
अब तुम सदा मेरे पास हो,
उदभव से लेकर,
समाहित होने तक.

Sunday, March 1, 2009
सूत सी इच्छाएं...
सूत सी इच्छाएं...
रोते रोते
जी चाहता है,
मोम की तरह गलती जाऊं.
दीवार से चिपककर
उसमें समा जाऊं.
पर क्या करुं!
हाड-मांस की हूं जो!
जलने पर बू आती है.
और
सामने खडा वो
मुझसे दूर भागता है.
मेरी सूत सी इच्छाओं को
कोई
उस आग से
खींचकर
बाहर नहीं निकालता.
रोते रोते
जी चाहता है,
मोम की तरह गलती जाऊं.
दीवार से चिपककर
उसमें समा जाऊं.
पर क्या करुं!
हाड-मांस की हूं जो!
जलने पर बू आती है.
और
सामने खडा वो
मुझसे दूर भागता है.
मेरी सूत सी इच्छाओं को
कोई
उस आग से
खींचकर
बाहर नहीं निकालता.
Saturday, February 28, 2009
तुम मेरे पास हो...
तुम मेरे पास हो...
तुम ख्याल बन,
मेरी अधजगी रातों में उतरे हो।
मेरे मुस्काते लबों से लेकर...
उँगलियों की शरारत तक।
तुम सिमटे हो मेरी करवट की सरसराहट में,
कभी बिखरे हो खुशबू बनकर...
जिसे अपनी देह से लपेट,
आभास लेती हूँ तुम्हारे आलिंगन का।
जाने कितने रूप छुपे हैं तुम्हारे,
मेरी बन्द पलकों के कोनों में.
जाने कई घटनायें हैं
और गढ़ी हुई कहानियाँ.
जिनके विभिन्न शुरुआत हैं,
परंतु एक ही अंत
स्वप्न से लेकर ...उचटती नींद तक...
मेरे सर्वस्व पर तुम्हारा एकाधिपत्य।
तुम ख्याल बन,
मेरी अधजगी रातों में उतरे हो।
मेरे मुस्काते लबों से लेकर...
उँगलियों की शरारत तक।
तुम सिमटे हो मेरी करवट की सरसराहट में,
कभी बिखरे हो खुशबू बनकर...
जिसे अपनी देह से लपेट,
आभास लेती हूँ तुम्हारे आलिंगन का।
जाने कितने रूप छुपे हैं तुम्हारे,
मेरी बन्द पलकों के कोनों में.
जाने कई घटनायें हैं
और गढ़ी हुई कहानियाँ.
जिनके विभिन्न शुरुआत हैं,
परंतु एक ही अंत
स्वप्न से लेकर ...उचटती नींद तक...
मेरे सर्वस्व पर तुम्हारा एकाधिपत्य।
Thursday, February 26, 2009
जमाव
जमाव
तमतमाये सूरज ने मेरे गालों से लिपटी बूंदें सुखा डालीं.
ज़िन्दगी !
तूने जो भी दिया...उसका ग़म अब क्यों हों?
मैं जो हूँ
कुछ दीवारों और काँच के टुकड़ों के बीच.
जहाँ चन्द उजाले हैं.
कुछ अंधेरे घंटे भी.
कुछ खास भी नहीं
जिसमें सिमटी पड़ी रहूँ.
खाली सड़क पर
न है किसी राहगीर का अंदेशा.
तारों से भी डरती हूँ
कि जाने
मेरे आँचल को क्या प्राप्त हो?
फिर भी
हवा तो है!
मेरी खिड़की के बाहर
उड़ती हुई नन्हीं चिड़ियों की कतार भी है।
मेरे लिये
ठहरी ज़मीं है
ढाँपता आसमां है.
ऐ ज़िन्दगी!
तेरे हर लिबास को जब ओढ़ना हीं है
तो उनके रंगों में फ़र्क करने से क्या हासिल ?
Wednesday, February 25, 2009
...और बातें हो जायेंगी
...और बातें हो जायेंगी
आओ...
हम साथ बैठें।
पास बैठें।
कभी खोलूँ
कभी पहनूँ मैं अपनी अँगूठी।
तुम्हारे चेहरे को टिकाए
तुम्हारी ही कसी हुई मुट्ठी।
चमका करे धुली हुई मेज़
हमारे नेत्रों के अपलक परावर्तन से।
और तब तक
अंत: मंडल डबडबाए
प्रश्न उत्तरों के प्रत्यारोपण से।
विद्युत बन बहे
हमारे साँसों के धन-ऋण का संगम
हाँ प्रिय!
नहीं चढ़ायेंगे हम
भावनाओं पर शब्द रूप आवरण।
आओ...
हम साथ बैठें।
पास बैठें।
कभी खोलूँ
कभी पहनूँ मैं अपनी अँगूठी।
तुम्हारे चेहरे को टिकाए
तुम्हारी ही कसी हुई मुट्ठी।
चमका करे धुली हुई मेज़
हमारे नेत्रों के अपलक परावर्तन से।
और तब तक
अंत: मंडल डबडबाए
प्रश्न उत्तरों के प्रत्यारोपण से।
विद्युत बन बहे
हमारे साँसों के धन-ऋण का संगम
हाँ प्रिय!
नहीं चढ़ायेंगे हम
भावनाओं पर शब्द रूप आवरण।
Monday, February 23, 2009
इस बार
इस बार
अनगिनत आँगन
अनगिनत छत,
अनगिनत दिये
और उनके उजालों का कोलाहल..
इनके बीच
कहीं गुम सी मैं,
कहीं भागने की हठ करता हुआ
लौ सा मचलता मेरा मन...
वो एकाकी
जो तुम्हारे गले लग कर
मुझसे लिपटने आया है
उसकी तपिश में
हिम सी पिघलती मेरी नज़रें...
मुझसे निकलकर
मुझको ही डुबोती हुई...
इस शोर और रौशनी का हाथ पकड़कर,
छलक उठे हैं चाँद पर
मेरी भावनाओं के अक्स,
और उन्हें सहलाते हुए
चन्द प्रतिलक्षित तारे,
फिर कहीं
आच्छादित धुआँ,
असहनीय आवाज़ें,
आभासित अलसाई सुबह,
और उन जमी हुई मोमबत्ती की बूँदों के नीचे
दबी मैं व मेरा सहमा मन.
एक रात अवांछित सी आई है इस बार
अनगिनत आँगन
अनगिनत छत,
अनगिनत दिये
और उनके उजालों का कोलाहल..
इनके बीच
कहीं गुम सी मैं,
कहीं भागने की हठ करता हुआ
लौ सा मचलता मेरा मन...
वो एकाकी
जो तुम्हारे गले लग कर
मुझसे लिपटने आया है
उसकी तपिश में
हिम सी पिघलती मेरी नज़रें...
मुझसे निकलकर
मुझको ही डुबोती हुई...
इस शोर और रौशनी का हाथ पकड़कर,
छलक उठे हैं चाँद पर
मेरी भावनाओं के अक्स,
और उन्हें सहलाते हुए
चन्द प्रतिलक्षित तारे,
फिर कहीं
आच्छादित धुआँ,
असहनीय आवाज़ें,
आभासित अलसाई सुबह,
और उन जमी हुई मोमबत्ती की बूँदों के नीचे
दबी मैं व मेरा सहमा मन.
एक रात अवांछित सी आई है इस बार
Sunday, February 22, 2009
अस्तित्व
अस्तित्व
मुझसे वो पूछता है
कि अब तुम कहाँ हो?
घर के उस कोने से
तुम्हारा निशां धुल गया
है वो आसमां वीरां,
जहाँ भटका करती थी तुम,
कहाँ गया वो हुनर
खुद को उढ़ेलने का?
अपनी ज़िन्दगी का खाँचा बना
शतरंज की गोटियाँ चराती फिरती हो...
कहाँ राख भरोगी?
कहाँ भरोगी एक मुखौटा?
खा गयी एक शीत-लहर
तुम्हारे उबाल को..
अब
तुम्हें भी
इशारों पर मुस्काने की आदत पड़ गयी है।
तुम भी
इस नाली का कीड़ा ही रही
भाती है जिसपर..
वही अदना सी ज़िन्दगी..
वही अदना सी मौत..
मुझसे वो पूछता है
कि अब तुम कहाँ हो?
घर के उस कोने से
तुम्हारा निशां धुल गया
है वो आसमां वीरां,
जहाँ भटका करती थी तुम,
कहाँ गया वो हुनर
खुद को उढ़ेलने का?
अपनी ज़िन्दगी का खाँचा बना
शतरंज की गोटियाँ चराती फिरती हो...
कहाँ राख भरोगी?
कहाँ भरोगी एक मुखौटा?
खा गयी एक शीत-लहर
तुम्हारे उबाल को..
अब
तुम्हें भी
इशारों पर मुस्काने की आदत पड़ गयी है।
तुम भी
इस नाली का कीड़ा ही रही
भाती है जिसपर..
वही अदना सी ज़िन्दगी..
वही अदना सी मौत..
Wednesday, February 18, 2009
अनुरोध
अनुरोध
हे बादल!
अब मेरे आँचल में
तृणों की लहराई डार नहीं,
न है तुम्हारे स्वागत के लिये
ढेरों मुस्काते रंग.
मेरा ज़िस्म
ईंट और पत्थरों के बोझ के तले
दबा है.
उस तमतमाये सूरज से भागकर
जो उबलते इंसान
इन छतों के नीचे पका करते हैं
तुम नहीं जानते...
कि
एक तुम ही हो
जिसके मृदु फुहार की
आस रहती है इन्हें.
बादल!
तुम बरस जाना...
अपनी ही बनाई
कंक्रीट की दुनिया से ऊबे लोग
अपनी शर्म धोने अब कहाँ जायें?

हे बादल!
अब मेरे आँचल में
तृणों की लहराई डार नहीं,
न है तुम्हारे स्वागत के लिये
ढेरों मुस्काते रंग.
मेरा ज़िस्म
ईंट और पत्थरों के बोझ के तले
दबा है.
उस तमतमाये सूरज से भागकर
जो उबलते इंसान
इन छतों के नीचे पका करते हैं
तुम नहीं जानते...
कि
एक तुम ही हो
जिसके मृदु फुहार की
आस रहती है इन्हें.
बादल!
तुम बरस जाना...
अपनी ही बनाई
कंक्रीट की दुनिया से ऊबे लोग
अपनी शर्म धोने अब कहाँ जायें?

Monday, February 16, 2009
व्यर्थ विषय
व्यर्थ विषय
क्षणिक भ्रमित प्यार पाकर तुम क्या करोगे?
आकाशहीन-आधार पाकर तुम क्या करोगे?
तुम्हारे हीं कदमों से कुचली, रक्त-रंजित भयी,
सुर्ख फूलों का हार पाकर तुम क्या करोगे?
जिनके थिरकन पर न हो रोने हँसने का गुमां
ऐसी घुंघरू की झनकार पाकर तुम क्या करोगे?
अभिशप्त बोध करता हो जो देह तुम्हारे स्पर्श से,
उस लाश पर अधिकार पाकर तुम क्या करोगे?
तुम जो मूक हो, कहीं बधिर, तो कुछ अंध भी
मेरी कथा का सार पाकर तुम क्या करोगे?
क्षणिक भ्रमित प्यार पाकर तुम क्या करोगे?
आकाशहीन-आधार पाकर तुम क्या करोगे?
तुम्हारे हीं कदमों से कुचली, रक्त-रंजित भयी,
सुर्ख फूलों का हार पाकर तुम क्या करोगे?
जिनके थिरकन पर न हो रोने हँसने का गुमां
ऐसी घुंघरू की झनकार पाकर तुम क्या करोगे?
अभिशप्त बोध करता हो जो देह तुम्हारे स्पर्श से,
उस लाश पर अधिकार पाकर तुम क्या करोगे?
तुम जो मूक हो, कहीं बधिर, तो कुछ अंध भी
मेरी कथा का सार पाकर तुम क्या करोगे?
Wednesday, February 4, 2009
ज़बह
ज़बह
हर रोज़
मेरी खाल उतरती है.
मुझे
एक हुक से टांगा जाता है.
थोडी थोडी देर में
मुझे
थोड़ा थोड़ा काटा जाता है.
अपने शरीर से
टपके रक्त को
बूँद बूँद उठा
मैं देह से चिपकाती हूँ.
फिर
खाल उतरवाने को
तैयार हो जाती हूँ.
Tuesday, February 3, 2009
तुम्हारी बात
तुम्हारी बात
तुम जो कहते हो
उसे आवरण बना
अपने सर्वस्व को
उससे लपेट लेती हूँ
वह मेरी ऊर्जा को
सहेजता है
मुझे
अपने स्पर्श से
उष्मित करता है
तुम जो कहते हो
उसे ओढ़कर मैं
ख़ुद को
जीवन-अनल मध्य
प्रहलाद सा सुरक्षित पाती हूँ
तुम जो कहते हो
वह मेरे चेहरे पर
ऐसे खिलता है
ज्यों
प्रातः किरण से आभूषित
दमकता सूर्य
दिन चढ़े या शाम ढले
तुम्हारे कहे हुए को हीं
रत्न सा जड़ लेती हूँ
रात्रि पर्यन्त उसका श्रिंगार किए
मैं सो जाती हूँ
आज के आश्वासन
और
कल की आस के साथ
तुम जो कहते हो
उसे आवरण बना
अपने सर्वस्व को
उससे लपेट लेती हूँ
वह मेरी ऊर्जा को
सहेजता है
मुझे
अपने स्पर्श से
उष्मित करता है
तुम जो कहते हो
उसे ओढ़कर मैं
ख़ुद को
जीवन-अनल मध्य
प्रहलाद सा सुरक्षित पाती हूँ
तुम जो कहते हो
वह मेरे चेहरे पर
ऐसे खिलता है
ज्यों
प्रातः किरण से आभूषित
दमकता सूर्य
दिन चढ़े या शाम ढले
तुम्हारे कहे हुए को हीं
रत्न सा जड़ लेती हूँ
रात्रि पर्यन्त उसका श्रिंगार किए
मैं सो जाती हूँ
आज के आश्वासन
और
कल की आस के साथ
प्रवाह
प्रवाह
बनकर नदी जब बहा करूँगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
अपनी आँखों से कहा करूँगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
हर कथा रचोगे एक सीमा तक
बनाओगे पात्र
नचाओगे मुझे
मेरी कतार को काटकर तुम
एक भीड़ का हिस्सा बनाओगे मुझे
मेरी उड़ान को व्यर्थ बता
हँसोगे मुझपर,
टोकोगे मुझे
एक तस्वीर बता,
दीवार पर चिपकाओगे मुझे,
पर जब...
अपने ही जीवन से कुछ पल चुराकर
मैं चुपके से जी लूँ!
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
तुम्हें सोता देख,
मैं अपने सपने सी लूँ!
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
एक राख को साथ रखूँगी,
अपनी कविता के कान भरूँगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
जितना सको
प्रयास कर लो इसे रोकने की,
इसके प्रवाह का अन्दाज़ा तो मुझे भी नहीं अभी!
बनकर नदी जब बहा करूँगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
अपनी आँखों से कहा करूँगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
हर कथा रचोगे एक सीमा तक
बनाओगे पात्र
नचाओगे मुझे
मेरी कतार को काटकर तुम
एक भीड़ का हिस्सा बनाओगे मुझे
मेरी उड़ान को व्यर्थ बता
हँसोगे मुझपर,
टोकोगे मुझे
एक तस्वीर बता,
दीवार पर चिपकाओगे मुझे,
पर जब...
अपने ही जीवन से कुछ पल चुराकर
मैं चुपके से जी लूँ!
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
तुम्हें सोता देख,
मैं अपने सपने सी लूँ!
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
एक राख को साथ रखूँगी,
अपनी कविता के कान भरूँगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
जितना सको
प्रयास कर लो इसे रोकने की,
इसके प्रवाह का अन्दाज़ा तो मुझे भी नहीं अभी!
Thursday, December 4, 2008
आस

आस
बड़ी आस थी
उनदिनों,
के मेरे ज्वलंत मस्तक पर
तुम अपने होंठों से ठंडी ओस मलते,
और
मेरी समस्याएं
छनछनाकर भाप बन उड़ जातीं.
तुम्हारी बाहों में
मेरा हर भार होता
और मैं पेंग बढाकर
आसमान तक हो आती.
तुम्हारे वक्ष की गरमाहट
मुझे बर्फ न बनने देता.
मैं पानी होती
मुझमे भी जीवन होता.
बड़ी आस थी उनदिनों,
के तुम होते.
आस
अब भी जीवित है.
क्या तुम
कभी होगे?
बड़ी आस थी
उनदिनों,
के मेरे ज्वलंत मस्तक पर
तुम अपने होंठों से ठंडी ओस मलते,
और
मेरी समस्याएं
छनछनाकर भाप बन उड़ जातीं.
तुम्हारी बाहों में
मेरा हर भार होता
और मैं पेंग बढाकर
आसमान तक हो आती.
तुम्हारे वक्ष की गरमाहट
मुझे बर्फ न बनने देता.
मैं पानी होती
मुझमे भी जीवन होता.
बड़ी आस थी उनदिनों,
के तुम होते.
आस
अब भी जीवित है.
क्या तुम
कभी होगे?
Wednesday, July 30, 2008
तुम्हारे फूल

तुम्हारे फूल
तुम्हारे फूलों ने जब
मेरी सुबह की पहली साँसें महकायीं
मैंने चाहा था,
उसी वक्त तितली बन जाऊँ
मंडराऊँ खूब
उन ख़ुशबू भरे खिलखिलाते रंगों पर
बहकूँ सारा दिन उसी की महक से
महकूँ सारी रात उसी की लहक से
खुद को बटोरकर
उस गुलदस्ते का हिस्सा बन जाऊँ
अपने घर को महकाऊँ
पड़ी रहूँ दिन रात उसे लपेटे
बिखेरूँ
या सहेजूँ उसकी पंखुड़ियाँ
सजा लूँ उससे अपने अस्तित्व को
या सज लूँ मैं
कि वो हो
या ये
मैं चाह रही हूँ अब भी
अपनी पंक्तियों की शुरुआत
जो हो अंत से अनजान।
Friday, April 4, 2008
तुम्हारी याद
तुम्हारी याद
तुम्हारी याद आते आते कहीं उलझ जाती है,
जैसे चाँद बिल्डिंगों में अंटक गया हो कहीं,
मेरे रास्ते तनहा तय होते हैं,
सपाट रोड और उजाड़ आसमान के बीच.
कुहासों की कुनकुनाहट,
भौंकते कुत्ते सुनने नही देते.
हवा गुम गई है.
पत्थर जम गए हैं.
रातें सर्द हैं.
सिर्फ़ बर्फ हैं.
अब तुम्हारे हथेलियों की गरमाहट कहाँ?
जिससे उन्हें पिघलाऊँ?
और बूँद-बूँद पी जाऊं!
नशे मे,
रंगीन रात की प्रत्यंचा पर तीर चढाऊँ, बौराऊँ !
अब तो
सिर्फ़ बिंधा हुआ आँचल है,
जिसकी छेद से जो दिखता है,
वही गंतव्य है, दिशा है,
मैं उसी ओर चलती हूँ,
अंटके हुए चाँद को,
कंक्रीटों में ढूँढती हूँ.
तुम्हारी याद आते आते कहीं उलझ जाती है,
जैसे चाँद बिल्डिंगों में अंटक गया हो कहीं,
मेरे रास्ते तनहा तय होते हैं,
सपाट रोड और उजाड़ आसमान के बीच.
कुहासों की कुनकुनाहट,
भौंकते कुत्ते सुनने नही देते.
हवा गुम गई है.
पत्थर जम गए हैं.
रातें सर्द हैं.
सिर्फ़ बर्फ हैं.
अब तुम्हारे हथेलियों की गरमाहट कहाँ?
जिससे उन्हें पिघलाऊँ?
और बूँद-बूँद पी जाऊं!
नशे मे,
रंगीन रात की प्रत्यंचा पर तीर चढाऊँ, बौराऊँ !
अब तो
सिर्फ़ बिंधा हुआ आँचल है,
जिसकी छेद से जो दिखता है,
वही गंतव्य है, दिशा है,
मैं उसी ओर चलती हूँ,
अंटके हुए चाँद को,
कंक्रीटों में ढूँढती हूँ.
Friday, March 21, 2008
मेरी होली
मेरी होली
ये फागुनी नशा है औ बसन्ती है जादू
मेरी आँखें बिन भंग लाल-लाल हो गईं
साजन ने बाहों में भर के रंग डाला
अबके होली में मैं मालामाल हो गई ।
मुझ-हीं से लेके रंग, मुझ-हीं को लगाए
है तू रंग मेरा जो रंग इतने दिखाए
तू तिलक माथे की, मेरे गालों की लाली
कान्हा मेरी गोद तुझसे गुलाल हो गई ।
कोरे आंचल ने मुझको है हर रंग बाँटे
होलिका-सी जो जलके मुझे होली-सी साजे
जिस मरुथल के अश्रु से मैं होती रही तर
उस कोख से जनम कर निहाल हो गई ।
हर-रिश्ता हर-रंग-सा पिचकारी भरा है
जिनकी फुहारों से मेरा आंगन सजा है
ये स्नेह मेरी शान मेरा मान - गुमान
जिसे पाके मेरी हंस-सी चाल हो गई ।
ये फागुनी नशा है औ बसन्ती है जादू
मेरी आँखें बिन भंग लाल-लाल हो गईं
साजन ने बाहों में भर के रंग डाला
अबके होली में मैं मालामाल हो गई ।
मुझ-हीं से लेके रंग, मुझ-हीं को लगाए
है तू रंग मेरा जो रंग इतने दिखाए
तू तिलक माथे की, मेरे गालों की लाली
कान्हा मेरी गोद तुझसे गुलाल हो गई ।
कोरे आंचल ने मुझको है हर रंग बाँटे
होलिका-सी जो जलके मुझे होली-सी साजे
जिस मरुथल के अश्रु से मैं होती रही तर
उस कोख से जनम कर निहाल हो गई ।
हर-रिश्ता हर-रंग-सा पिचकारी भरा है
जिनकी फुहारों से मेरा आंगन सजा है
ये स्नेह मेरी शान मेरा मान - गुमान
जिसे पाके मेरी हंस-सी चाल हो गई ।
Thursday, February 28, 2008
कुछ यूं हीं...
सोज़ - ओ - साज़ बिन कैसे तराने सुनते
आमों के मंजर, कोयल के गाने सुनते
न टूटता दम, न दिल, न यकीं, न अज़ां
चटकती कली की खिलखिलाहट ग़र वीराने सुनते
हारकर छोड़ हीं दी तेरे आने की उम्मीद
आखिर कब तलक तुम्हारे बहाने सुनते
क़ैस की ज़िन्दगी थी लैला की धड़कन
पत्थर की बुतों में अब क्या दीवाने सुनते
मेरी फ़ुगां तो मेरे अश्कों मे निहां थी
अनकही फ़र्याद को कैसे ज़माने सुनते
बयान-ए-हकीक़त भी कब हसीं होता है
और आप भी कब तक मेरे अफ़साने सुनते
आमों के मंजर, कोयल के गाने सुनते
न टूटता दम, न दिल, न यकीं, न अज़ां
चटकती कली की खिलखिलाहट ग़र वीराने सुनते
हारकर छोड़ हीं दी तेरे आने की उम्मीद
आखिर कब तलक तुम्हारे बहाने सुनते
क़ैस की ज़िन्दगी थी लैला की धड़कन
पत्थर की बुतों में अब क्या दीवाने सुनते
मेरी फ़ुगां तो मेरे अश्कों मे निहां थी
अनकही फ़र्याद को कैसे ज़माने सुनते
बयान-ए-हकीक़त भी कब हसीं होता है
और आप भी कब तक मेरे अफ़साने सुनते
Wednesday, January 23, 2008
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!

ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
इस दिल में क्या क्या अरमां छुपे
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
कोई नेह नहीं कोई सेज नहीं
कोई चांदी की पाजेब नहीं
बेकरार रात का चाँद नहीं
कोई सपनों का सामान नहीं
इन पत्तों की झनकार तले
किस थाप-राग मे हृदय घुले
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
न भाषा कोई के कह दूँ मैं
न आग-आह जो सह लूँ मैं
विकल बड़ा यह श्वास सा
शब्दहीन विचलित आस सा
जहाँ इंद्रधनुष व क्षितिज मिले
कुछ ऐसी जगह वह पले बढ़े
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
इस दिल में क्या क्या अरमां छुपे
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
कुछ यूँ हीं...
जिन्दगी चल ! तुझे बांटती हूँ
उनसे कट कर, खुद को काटती हूँ
कितनों में जिया, कितनों ने मारा मुझे
लम्हों को कुछ इस तरह छांटती हूँ
ठूंठ मे बची हरी टहनियां चुनकर
नाम उनका ले, ज़मीं में गाडती हूँ
जिन्दगी चल ! तुझे बांटती हूँ...
उनसे कट कर, खुद को काटती हूँ
कितनों में जिया, कितनों ने मारा मुझे
लम्हों को कुछ इस तरह छांटती हूँ
ठूंठ मे बची हरी टहनियां चुनकर
नाम उनका ले, ज़मीं में गाडती हूँ
जिन्दगी चल ! तुझे बांटती हूँ...
ढूँढती हूँ...
उनको बिसारकर ढूँढती हूँ।
पहर-दर-पहर ढूँढती हूँ।
खाकर ज़हर ज़िन्दगी का,
शाम को, सहर ढूँढती हूँ।
अपने लफ्जों का गला घोंट,
उनमें असर ढूँढती हूँ।
अन्तिम पड़ाव पर आज,
अगला सफ़र ढूँढती हूँ।
बर्दाश्त की हद देखने को,
एक और कहर ढूँढती हूँ।
दीवारें न हों घरों के सिवा,
ऐसा एक शहर ढूँढती हूँ।
रंग बागों का जीवन में भरे,
फूलों का वो मंजर ढूँढती हूँ।
इश्क की रूह ज़िन्दा हो जहाँ,
ऐसी इक नज़र ढूँढती हूँ।
दिल को खुश करना चाहूँ,
वादों का नगर ढूँढती हूँ।
रौशनी आते आते टकरा गई,
सीधी - सी डगर ढूँढती हूँ।
छोड़ जाय मेरे आस का मोती,
किनारे खड़ी वो लहर ढूँढती हूँ।
जो मुझे डसता है छूटते ही,
उसी के लिये ज़हर ढूँढती हूँ।
जानती हूँ कोई साथ नहीं देता।
क्या हुआ ! अगर ढूँढती हूँ।
कौन कहता है कि मै ज़िन्दा हूँ?
ज़िन्दगी ठहर ! ढूँढती हूँ!
पत्थर में भगवान बसते हैं,
मिलते नहीं, मगर ढूँढती हूँ।
पहर-दर-पहर ढूँढती हूँ।
खाकर ज़हर ज़िन्दगी का,
शाम को, सहर ढूँढती हूँ।
अपने लफ्जों का गला घोंट,
उनमें असर ढूँढती हूँ।
अन्तिम पड़ाव पर आज,
अगला सफ़र ढूँढती हूँ।
बर्दाश्त की हद देखने को,
एक और कहर ढूँढती हूँ।
दीवारें न हों घरों के सिवा,
ऐसा एक शहर ढूँढती हूँ।
रंग बागों का जीवन में भरे,
फूलों का वो मंजर ढूँढती हूँ।
इश्क की रूह ज़िन्दा हो जहाँ,
ऐसी इक नज़र ढूँढती हूँ।
दिल को खुश करना चाहूँ,
वादों का नगर ढूँढती हूँ।
रौशनी आते आते टकरा गई,
सीधी - सी डगर ढूँढती हूँ।
छोड़ जाय मेरे आस का मोती,
किनारे खड़ी वो लहर ढूँढती हूँ।
जो मुझे डसता है छूटते ही,
उसी के लिये ज़हर ढूँढती हूँ।
जानती हूँ कोई साथ नहीं देता।
क्या हुआ ! अगर ढूँढती हूँ।
कौन कहता है कि मै ज़िन्दा हूँ?
ज़िन्दगी ठहर ! ढूँढती हूँ!
पत्थर में भगवान बसते हैं,
मिलते नहीं, मगर ढूँढती हूँ।
Wednesday, July 25, 2007
मेरी दुनिया

ये ख्वाबों ख्यालों विचारों की दुनिया
मन को दुखाते कुछ सवालों की दुनिया
उस कोने पडी एक शराब की बोतल
इस कोने पडी खाली थालों की दुनिया
दौड्ते औ भागते रास्तों का फन्दा
या तन्हा सिसकती राहों की दुनिया
तू कौन क्या तेरा क्या उसका क्या मेरा
कुछ बनते बिगडते सहारॊं की दुनिया
एक कमरे मे पलते सपनों की दुनिया
एक कमरे मे ख्वाब के मज़ारों की दुनिया
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