सोज़ - ओ - साज़ बिन कैसे तराने सुनते
आमों के मंजर, कोयल के गाने सुनते
न टूटता दम, न दिल, न यकीं, न अज़ां
चटकती कली की खिलखिलाहट ग़र वीराने सुनते
हारकर छोड़ हीं दी तेरे आने की उम्मीद
आखिर कब तलक तुम्हारे बहाने सुनते
क़ैस की ज़िन्दगी थी लैला की धड़कन
पत्थर की बुतों में अब क्या दीवाने सुनते
मेरी फ़ुगां तो मेरे अश्कों मे निहां थी
अनकही फ़र्याद को कैसे ज़माने सुनते
बयान-ए-हकीक़त भी कब हसीं होता है
और आप भी कब तक मेरे अफ़साने सुनते
Thursday, February 28, 2008
Wednesday, January 23, 2008
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!

ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
इस दिल में क्या क्या अरमां छुपे
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
कोई नेह नहीं कोई सेज नहीं
कोई चांदी की पाजेब नहीं
बेकरार रात का चाँद नहीं
कोई सपनों का सामान नहीं
इन पत्तों की झनकार तले
किस थाप-राग मे हृदय घुले
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
न भाषा कोई के कह दूँ मैं
न आग-आह जो सह लूँ मैं
विकल बड़ा यह श्वास सा
शब्दहीन विचलित आस सा
जहाँ इंद्रधनुष व क्षितिज मिले
कुछ ऐसी जगह वह पले बढ़े
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
इस दिल में क्या क्या अरमां छुपे
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
कुछ यूँ हीं...
जिन्दगी चल ! तुझे बांटती हूँ
उनसे कट कर, खुद को काटती हूँ
कितनों में जिया, कितनों ने मारा मुझे
लम्हों को कुछ इस तरह छांटती हूँ
ठूंठ मे बची हरी टहनियां चुनकर
नाम उनका ले, ज़मीं में गाडती हूँ
जिन्दगी चल ! तुझे बांटती हूँ...
उनसे कट कर, खुद को काटती हूँ
कितनों में जिया, कितनों ने मारा मुझे
लम्हों को कुछ इस तरह छांटती हूँ
ठूंठ मे बची हरी टहनियां चुनकर
नाम उनका ले, ज़मीं में गाडती हूँ
जिन्दगी चल ! तुझे बांटती हूँ...
ढूँढती हूँ...
उनको बिसारकर ढूँढती हूँ।
पहर-दर-पहर ढूँढती हूँ।
खाकर ज़हर ज़िन्दगी का,
शाम को, सहर ढूँढती हूँ।
अपने लफ्जों का गला घोंट,
उनमें असर ढूँढती हूँ।
अन्तिम पड़ाव पर आज,
अगला सफ़र ढूँढती हूँ।
बर्दाश्त की हद देखने को,
एक और कहर ढूँढती हूँ।
दीवारें न हों घरों के सिवा,
ऐसा एक शहर ढूँढती हूँ।
रंग बागों का जीवन में भरे,
फूलों का वो मंजर ढूँढती हूँ।
इश्क की रूह ज़िन्दा हो जहाँ,
ऐसी इक नज़र ढूँढती हूँ।
दिल को खुश करना चाहूँ,
वादों का नगर ढूँढती हूँ।
रौशनी आते आते टकरा गई,
सीधी - सी डगर ढूँढती हूँ।
छोड़ जाय मेरे आस का मोती,
किनारे खड़ी वो लहर ढूँढती हूँ।
जो मुझे डसता है छूटते ही,
उसी के लिये ज़हर ढूँढती हूँ।
जानती हूँ कोई साथ नहीं देता।
क्या हुआ ! अगर ढूँढती हूँ।
कौन कहता है कि मै ज़िन्दा हूँ?
ज़िन्दगी ठहर ! ढूँढती हूँ!
पत्थर में भगवान बसते हैं,
मिलते नहीं, मगर ढूँढती हूँ।
पहर-दर-पहर ढूँढती हूँ।
खाकर ज़हर ज़िन्दगी का,
शाम को, सहर ढूँढती हूँ।
अपने लफ्जों का गला घोंट,
उनमें असर ढूँढती हूँ।
अन्तिम पड़ाव पर आज,
अगला सफ़र ढूँढती हूँ।
बर्दाश्त की हद देखने को,
एक और कहर ढूँढती हूँ।
दीवारें न हों घरों के सिवा,
ऐसा एक शहर ढूँढती हूँ।
रंग बागों का जीवन में भरे,
फूलों का वो मंजर ढूँढती हूँ।
इश्क की रूह ज़िन्दा हो जहाँ,
ऐसी इक नज़र ढूँढती हूँ।
दिल को खुश करना चाहूँ,
वादों का नगर ढूँढती हूँ।
रौशनी आते आते टकरा गई,
सीधी - सी डगर ढूँढती हूँ।
छोड़ जाय मेरे आस का मोती,
किनारे खड़ी वो लहर ढूँढती हूँ।
जो मुझे डसता है छूटते ही,
उसी के लिये ज़हर ढूँढती हूँ।
जानती हूँ कोई साथ नहीं देता।
क्या हुआ ! अगर ढूँढती हूँ।
कौन कहता है कि मै ज़िन्दा हूँ?
ज़िन्दगी ठहर ! ढूँढती हूँ!
पत्थर में भगवान बसते हैं,
मिलते नहीं, मगर ढूँढती हूँ।
Wednesday, July 25, 2007
मेरी दुनिया

ये ख्वाबों ख्यालों विचारों की दुनिया
मन को दुखाते कुछ सवालों की दुनिया
उस कोने पडी एक शराब की बोतल
इस कोने पडी खाली थालों की दुनिया
दौड्ते औ भागते रास्तों का फन्दा
या तन्हा सिसकती राहों की दुनिया
तू कौन क्या तेरा क्या उसका क्या मेरा
कुछ बनते बिगडते सहारॊं की दुनिया
एक कमरे मे पलते सपनों की दुनिया
एक कमरे मे ख्वाब के मज़ारों की दुनिया
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